गर्भाधानसंस्कार के पश्चात् कृत्य
गर्भाधानसंस्कार विधिवत सम्पन्न हो जाना सृष्टिकर्म का प्रथम पायदान तुल्य है। आगे की क्रियायें और सावधानियाँ तो अब शुरु होने वाली हैं, जिसके लिए सिर्फ गर्भिणी स्त्री ही नहीं, बल्कि उसके पति सहित परिवार के अन्य जन को भी ध्यान रखना है। आयुर्विज्ञान के सिद्धान्तों के साथ-साथ पौराणिक कथाओं में भी इन नियमों और कृत्यों की विस्तृत चर्चा है। धर्मशास्त्र अपने ढंग से नियम सुझाते हैं,तो आधुनिक परिवेश के अनुसार डॉक्टर अपने हिसाब से औषधि-प्रयोग, सख्ती और परहेज सुझाते हैं और सनातनी व्यवस्था में निर्दिष्ट बातों पर ध्यान बिलकुल नहीं देते, जिसका दुष्परिणाम आए दिन लोग भुगत रहे हैं, फिर भी चेत नहीं रहे हैं।
मत्स्यपुराण के सप्तम अध्याय में दैत्यमाता दिति एवं महर्षि कश्यप सम्वादक्रम में गर्भिणीचर्या पर विस्तृत चर्चा है। कथा रोचक और ज्ञानवर्द्धक है। यहाँ सिर्फ गर्भकाल के पालनीय नियमों की चर्चा करते हैं। यथा— सन्ध्यायां नैव भोक्तव्यं गर्भिण्या वरवर्णिनि.... से संवाद शुरु होता है और ग्यारह श्लोकों में महर्षि बहुत कुछ कह जाते हैं, जिनपर आधुनिकाओं को अवश्य विचार करना चाहिए। हालाँकि बहुत सी बातें समयानुसार निरर्थक सिद्ध हो सकती हैं, फिर भी जितना पालनीय हो उसे तो करना ही चाहिए। पुरानी बातें कहकर विसार देना स्वयं पर दण्डप्रहार करने तुल्य है। संवाद के कुछ विशिष्ट अंशों की यहाँ चर्चा कर रहे हैं। गर्भिणीस्त्री को बहुत ही सावधान रहना चाहिए। सन्ध्याकाल में भोजन व शयन न करे। किसी वृक्ष के नीचे न जाए। घरेलू उपयोग की सामग्री—उखल, मुसल, चक्की आदि पर न बैठे। चौखट पर भी न बैठे। जल में घुसकर स्नान न करे। सुनसान घर में न जाए। मन को उद्विग्न करने वाले विचारों से बचे। नख अथवा किसी चीज से धरती पर न कुरेदे। कठिन परिश्रम न करे और हमेशा विश्राम में ही न रहे। शरीर को ऐंठे-मरोड़े नहीं(अंगड़ाई न ले)। बाल खुला न रखे। यथासम्भव शरीर और चित्त शैय्या और वस्त्र स्वच्छ और शुद्ध रखे। उत्तरदिशा में सिर करके कभी न सोए। अमंगल वाणी का प्रयोग न करे। जड़ी-बूटियों से युक्त ऋतु के अनुसार गरम या ठंढे जल से स्नान करे। लम्बे उपवास वाले व्रत न करे। जो गर्भिणी स्त्री इन नियमों का पालन करती है,उसे सुन्दर ,बलिष्ट, दीर्घायु सन्तान की प्राप्ति होती है।सुश्रुतसंहिता शारीरस्थान ३-१६ एवं १०-३, तथा चरकसंहिता शारीरस्थान ४-१८ में गर्भिणीकृत्य की चर्चा है। यथा— तदा प्रभृति व्यवायं व्यायायाममतितर्पणमतिकर्शनं दिवास्वप्नं रात्रिजागरणं शोकं यानारोहणं भयमुत्कुटुकासनं चैकान्ततः स्नेहादिक्रियां शोणितमोक्षणं चाकाले वेगविधारणं च न सेवेत....। ऋषि कहते हैं कि जिस समय से गर्भिणी के गर्भस्पष्ट हो जाए,उसी समय से व्यायाम, व्यवाय (मैथुन), अपतर्पण-अतिकर्षण (शरीर को घटाने-बढाने वाला आहार-विहार, उपचार), दिन में सोना, रात्रि में जागना, भय-शोकादि, रथादि सवारी, उत्कटासन(उकड़ूबैठना), असमय में स्नेहनादि कर्म, रक्तमोक्षण एवं मल-मूत्र-वेगधारण से यत्नपूर्वक परहेज करना चाहिए। गर्भवती को यथासम्भव प्रसन्नचित्त रहने का प्रयास करना चाहिए। स्तवन, भजन, स्वस्तिवाचन, स्वाध्याय, देवार्जनादि में चित्त को रमाना चाहिए। घृणा-भयोत्पादक दृश्यों से बचना चाहिए। खाली सुनसान स्थान में टहलना, सोना, बैठना नहीं चाहिए। शुष्क, नीरस, वासी, कुपथ्य अन्नादि का भक्षण नहीं करना चाहिए। बारबार तैलाभ्यंग और उत्सादन (उबटन) का प्रयोग नहीं करना चाहिए। शय्या, आसनादि कोमल सुखदायी हों। रूचिकर,प्रिय, मधुररसयुक्त, स्निग्ध, अग्निवर्धक, दीपनीय द्रव्यों का विशेष सेवन करना चाहिए। गुरु (जिसे पचने में विलम्ब हो), अतिउष्ण, अतितीक्ष्ण आहारों का सेवन एवं दारूण (कठिन) चेष्टाओं से बचना चाहिए। रक्त वस्त्र (लाल कपड़े) न पहने। मदकारक (नशा), मांसादि का सेवन कदापि न करे। अनुभवी स्त्रियों के निर्देशों का पालन करे। ये सारे नियम प्रारम्भ से प्रसूतिकाल पर्यन्त पालनीय हैं। इनका उलंघन करने पर गर्भोपघातक स्थिति उपस्थित हो सकती है।
उक्त पौराणिक और आयुर्वेदीय नियमों के बाद अब किंचित् धर्मशास्त्रीय नियमों का भी अवलोकन करलें। श्री कमलाकर भट्ट प्रणीत निर्णयसिन्धु धर्मशास्त्र विषयक अद्भुत संग्रह है। इसके तृतीयपरिच्छेद पूर्वाध में कहा गया है— सामिषमशनं यत्नात्प्रमदा परिवर्जयेदतः प्रभृति। स्पष्ट है मांसाहार की सख्त वर्जना है शास्त्रों में, जबकि पाश्चात्य मतानुरागियों को अंडे-मांस ही सर्वाधिक पौष्टिक नजर आते हैं।
गर्भिणी के पति हेतु वर्जना—
धर्मशास्त्रों में सिर्फ गर्भिणी ही नहीं, प्रत्युत उसके पति के लिए भी कई तरह के विधि-निषेधपरक संयम-नियम सुझाए गए हैं। हेमाद्रि के चतुर्वर्गचिन्तामणि में आचार्य कौण्डिन्य के निर्देश हैं कि गर्भिणीस्त्री के पति को मुण्डन, पिण्डदान, प्रेतक्रिया, शवयात्रा आदि नहीं करने चाहिए। यथा— मुण्डनं पिण्डदानं च प्रेतकर्मं च सर्वशः। न जीवत्पितृकः कुर्याद् गुर्विणीपतिरेव च ।। (यहाँ गुर्विणी शब्द गर्भिणी का पर्याय है)
रत्नसंग्रह नामक ग्रन्थ में ऋषि गालव के वचन भी उक्त वर्जनाओं के समतुल्य हैं। यहाँ पर्वतारोहण और नौकाविहार का भी निषेध किया है — दहनं वपनं चैव चौलं च गिरिरोहणम्। नावश्चारोहणं चैव वर्जयेद् गर्भिणीपतिः ।।
याज्ञवल्क्यस्मृति में कहा गया है—उदन्वतोऽम्भसि स्नानं नखकेशादिकर्तनम्। अन्तर्वत्न्याः पतिः कुर्वन्न प्रजा जायते ध्रुवम्।। (समुद्रस्नान, नख-केशादि कर्तन से गर्भस्थ सन्तान की हानि होती है।)
महर्षि आश्वलायन के वचन भी उक्त ऋषिसम्मत ही हैं— वपनं मैथुनं तीर्थं वर्जयेत् गर्भिणीपतिः । श्राद्धं च सप्तमा-सान्मासादूर्ध्वं चान्यत्र वेदवित् ।।
प्रयोगपारिजात में निषेधों को और स्पष्ट करते हुए कहा गया है कि दुर्भाग्यवश माता-पिता का श्राद्ध करना पड़े तो करे, अन्यथा अन्य श्राद्धकर्म, यहाँ तक कि श्राद्धभोजन से भी बचे। श्राद्धीयपरिसर में भी न जाए गर्भिणी व उसका पति।
कालविधान और मुहूर्तदीपिका में भी उक्त सभी विधि-निषेधों की सहमति है— क्षौरं शवानुगमनं नखकृन्तनं च युद्धादिवास्तुकरणं त्वतिदूरयानम् । उद्वाहमौपनयनं जलधेश्च गाहमायुः क्षयार्थमिति गर्भिणिकापतिनाम् ।।
दौहृदनी (दोहद) विचार (गर्भिणी की अभिलाषा) —
उक्त विधि-निषेधों की चर्चा के पश्चात् गर्भिणी की इच्छा पर विचार करते हैं। ज्योतिषीय यात्राप्रकरण में दोहद शब्द आया है, जो भिन्न अर्थबोधक है। दोहद शब्द आयुर्वेदादि ग्रन्थों में इच्छा के लिए प्रयुक्त हुआ है। महर्षि सुश्रुत कहते हैं कि दो हृदयवाली होने के कारण ‘दौहृदनी’ संज्ञा हुई गर्भिणीस्त्री की। गर्भ जब चार मास का हो जाए तब उसकी स्वतन्त्र इच्छाएं भी होने लगती है, जिसे प्रकृति माता के माध्यम से ही व्यक्त करती है। आधुनिक विचारक इसे अन्तःस्रावी ग्रन्थियों का प्रभाव कहते हैं। प्रारम्भ में अनिच्छा होती है और बाद में तरह-तरह की इच्छाएं होने लगती हैं गर्भिणी को। अतः इस पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए। क्योंकि इसका दुष्प्रभाव गर्भ पर पड़ना निश्चित है। किन्तु इसका ये अर्थ नहीं कि आधुनिकाओं को पिज्जा, वर्गर, फास्टफुड, मांस, मदिरा की इच्छा होने लगे तो उसे महर्षि वचन का संदर्भ देकर पूरा किया जाए।
सुश्रुतसंहिता ३-१८ एवं चरकसंहिता ४-१७ दोनों ग्रन्थों के शारीरस्थान में दोनों ऋषियों के लगभग एक से वचन हैं—सा यद्यदिच्छेत्तत्तस्यै दापयेत् लब्धदौहृदा हि वीर्यवन्तं चिरायुषं च पुत्रं जनयति। एवं सा यद्यदिच्छेत्तत्तदस्यै दद्यादन्यत्र गर्भोपधातकरेभ्यो भावेभ्यः।
ऋषि कहते हैं कि दौहृदिनी जिन-जिन वस्तुओं की इच्छा करे, उसे देना चाहिए। इच्छा पूर्ति होने पर सन्तान वीर्यशाली और दीर्घजीवी होती है। ध्यातव्य है वह जिस प्रकार की कामना करती है, तदनुसार ही (पदार्थानुसार) सन्तान का शरीर और स्वभाव होता है। पूर्व जन्म के कर्मानुसार ही बालक का शरीर बनता है। दैवयोग से ही ये इच्छाएँ भी जगती है, जो पूर्व के साथ-साथ भावी का भी संकेत हैं। गर्भस्पन्दन के साथ ही ये इच्छाएं बनने लगती हैं। माता के हृदय से बालक का हृदय रसवाही नाडियों द्वारा संपृक्त होता है, जिसके प्रभावस्वरूप ये लक्षण प्रकट होते हैं। अतः इसकी अवहेलना नहीं करनी चाहिए। प्रिय और हितकारी वस्तुओं से गर्भिणी की परिचर्या होनी चाहिए। ताकि गर्भ की सम्यक् पुष्टि हो। अतः अभिभावकों को चाहिए कि गर्भघातक पदार्थों से परहेज करते हुए इच्छा पूर्ति का प्रबन्ध करे। गर्भिणी की अभिलाषा-पूर्ति का समर्थन महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा भी भी किया गया है—
दौर्हृदस्याप्रदानेन गर्भो दोषमवाप्नुयात् । वैरूप्यं मरणं वापि तस्मात् कार्यं प्रियं स्त्रियाः ।। (या. स्मृ. प्रायश्चित प्रकरण ७९)
प्रसंगवश यहाँ कुछ और भी अत्यावश्यक बातों की चर्चा अपेक्षित है, जिनपर आधुनिकों का ध्यान नहीं जाता, या कहें जिनकी महत्ता नहीं समझी जाती।
सबसे बड़ी चूक है— जीवनशैली का आमूलचूल परिवर्तन। पश्चिमी ठंढे प्रदेशों की देखादेखी विवाहकाल में अप्राकृतिक विलम्ब। नौ से ग्यारह वर्ष के आसपास हमारे यहाँ किशोरियों का रजोदर्शन हो जा रहा है। सरकारी परिपक्वता की अवधि अठारह वर्ष है, जबकि विवाह की चेतना पचीस-तीस के बाद ही जगती है समाज में। जीवन सुव्यवस्थित होने की मारामारी, दहेज-कुप्रथा, नाना सामाजिक विसंगतियों में जीवन का बहुमूल्य समय व्यर्थ हो जाता है। प्राकृतिक रूप से शरीर इतना परिपुष्ट हो जाता है कि सम्यक् गर्भाधान होने में कठिनाई होने लगती है। आधुनिक डॉक्टर अपने हिसाब से निदान और उपचार सुझाते हैं। उनकी समझ में ‘वेडरेस्ट’ ही गर्भिणी के लिए सर्वोत्तम सुरक्षा है और इस मूर्खतापूर्ण सुझाव का परिणाम ये होता है कि शायद ही कोई सामान्य सुख-प्रसव (बिना सर्जरी के) सम्भव होता हो।
अतः उचित ये है कि यथासम्भव भारतीय जीवन-शैली को अपनाने का प्रयास करें। गर्भाधान के पश्चात् की जीवनशैली विशेष ध्यातव्य है। शारीरिक श्रम इतना न हो कि थकान होने लगे, सांस फूलने लगे, पसीने निकल आएं और इतना आराम भी न हो कि चौबीस घंटे विस्तर की शोभा बढ़ाते रहें। आहार-विहार पूर्ण सात्त्विक और स्वास्थ्यवर्द्धक हो। अद्यतन मनोरंजन के सुलभ साधन—टी.वी. और मोबाइल से जितनी दूरी बन सके, अच्छी बात है। गर्भिणी को चाहिए कि अपनी दिनचर्या में इष्टदेवता की पूजा और धार्मिक पुस्तकों का अध्ययन-मनन अवश्य शामिल करे। राम-कृष्ण आदि की बाललीलाओं से सम्बन्धित कथाओं और चित्रों पर विशेष ध्यान केन्द्रित करना चाहिए। आधुनिक मनोविज्ञान भी इन तथ्यों को अब स्वीकारने लगा है। सुभद्रापुत्र अभिमन्यु की चक्रव्यूहभेदन का अधूरा ज्ञान मनोवैज्ञानिकों और कायचिकित्सकों को नूतन शोध के लिए प्रेरित और आकर्षित करने लगे हैं। हमें चाहिए कि ऋषिप्रणीत ज्ञान-परम्परा का यथासम्भव हृदयंगम करें और जीवन में उतारें, ताकि मनोवांछित सन्तानसुख लब्ध हो सके। हम ईश्वर नहीं हैं, किन्तु ईश्वरकृपा से हमें बहुत कुछ ऐसा प्राप्त है, जिसपर हमारा ध्यान नहीं जाता। हम अपनी भावी सन्तति को देवता बनाना चाहते हैं या दैत्य या राक्षस—ये माता-पिता पर काफी हद तक निर्भर है। प्रत्येक माता-पिता की आकांक्षा होगी (होनी भी चाहिए) कि देवता बने न बने, कम से कम सम्पूर्ण रूप से मनुष्य तो बन ही जाए और इस पुनीत कार्य का शुभारम्भ गर्भावस्था में हो जाता है। यही कारण है कि गर्भाधान, पुंसवन और सीमन्त संस्कारों पर हमारे मनीषियों ने इतना जोर दिया है।
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