ऊर्जा संरक्षण के सिद्धांत




आज मैं आपने आर्टिकल के माध्यम से ऊर्जा संरक्षण के नियम (lawof conservation of energy ) पर कुछ लिख रहा हूं ।1841 में Julius Robert Mayer (जूलियस रॉबर्ट मेयर) ने ऊर्जा संरक्षण के लिए अपना सिद्धांत दिया दिया या नियम के बारे में विस्तार से बताया था की 
( The law of conservation of energy states that energy can neither be created nor be destroyed. Although, it may be transformed from one form to another.)
अर्थात  ऊर्जा के संरक्षण का नियम कहता है कि ऊर्जा को न तो बनाया जा सकता है और न ही नष्ट किया जा सकता है। हालाँकि, यह एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तित हो सकता है। जैसे यांत्रिक ऊर्जा को गति ऊर्जा में, । यही सिद्धांत को जगतगुरु श्री कृष्णा कुरुक्षेत्र रणभूमि में अर्जुन को गीता के उपदेश के माध्यम से यह सिद्धांत दिये थे वहां पर वह आत्मा को ऊर्जा के रूप में मानते हैं आत्मा असंख्य अनु परमाणु से बना है।उसमें स्वयं का एक प्रकाश होता है वह हर क्षण गतिशील होता है। पर गीता के दूसरे अध्याय अध्याय में कहते हैं कि
न जायते म्रियते वा कदाचि-
न्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः ।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो-
न हन्यते हन्यमाने शरीरे 
यह आत्मा किसी काल में भी न तो जन्मता है और न मरता ही है तथा न यह उत्पन्न होकर फिर होने वाला ही है क्योंकि यह अजन्मा, नित्य, सनातन और पुरातन है, शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मारा जाता॥
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय
नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि ।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा-
न्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥
इस श्लोक के माध्यम से वह कहना चाहते हैं कि आत्मा को न जन्म दिया जा सकता है और नहीं उसे विनाश किया जा सकता है वह एक  स्वरूप से दूसरे स्वरूप में परिवर्तित होता है । ए दोनों सिद्धांत मिलते हैं किंतु दुर्भाग्यवश कृष्ण को भूलकर जूलियस रॉबर्ट को ऊर्जा संरक्षण सिद्धांत के जनक के रूप में मानते हैं मानेभी क्यों नहीं क्योंकि आधुनिक युग के सनातन धर्मी वैज्ञानिक मनीषियों ने इसे संसार के सामने प्रकाशित ही नहीं की और वह मानते हैं कि सनातन धर्म ग्रंथ एक विज्ञानहीन अर्थहीन है आए हम सब इसके गर्त में  छुपे विज्ञान को प्रकाशित करने के प्रयासरत रहे।
मेरा यहां पर लिखने का तात्पर्य था कि आप सब वैदिक विज्ञान से रूबरू होय

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