धर्म और आधुनिक समाज (धर्म क्या है ?)
धर्म और आधुनिक समाज (धर्म क्या है?)
धर्म शब्द कानों में पड़ते ही लोगों के मन में पूजा-पाठ, मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे, गिरिजाघर, पण्डित, मौलवी, पादरी, साधु, सन्त जैसी अनेकानेक छवियाँ आने लगती हैं। आधुनिक समाज में धर्म शब्द का मूल अर्थ विकृत हो गया है।
अलग अलग मत के लोग धर्म को अपनी तरह से परिभाषित करते हैं। मुख्यतः धर्म शब्द का पर्याय मजहब और रिलीजन जैसे शब्दों को माना जाता है किन्तु ये किसी भी प्रकार उचित नहीं है। रिलीजन और मजहब जैसे शब्दों का अर्थ सम्प्रदाय से है जो अलग अलग विधियों से ईश्वर की साधना करते हैं।
किन्तु धर्म वह है जो शाश्वत है, कदाचित इसीलिए भगवान श्री कृष्ण ने भगवद्गीता में धर्म की हानि होने की बात कही है, धर्म का अन्त नहीं कहा।
'यदा यदा ही धर्मस्य *ग्लानिर्भवति* भारत।' (भगवद्गीता-4.7)
यह धर्म अनादिकाल से मनुष्य जाति की प्रकृति, स्वभाव और संस्कार में विद्यमान है किन्तु अपने अहं भाव और स्वार्थ के कारण मनुष्य अपने धर्म से इस तरह विमुख हुए हैं कि अब उन्हें धर्म की उचित परिभाषा तक नहीं पता।
महाभारत में मनुष्यों और पशुओं के बीच का अंतर धर्म को ही बताया गया है, यदि कोई मनुष्य अपने धर्म से हीन है तो उसे पशु की ही संज्ञा दी गई है।
जैसे-जैसे आधुनिक साहित्य और और संस्कृति का विकास हुआ, धर्म को केवल आडंबर और बेकार की बात समझा जाने लगा। भौतिक विकास के अन्धी दौड़ में मनुष्य यह भी भूल गया कि वो मनुष्य है पशु नहीं, उसके पास चेतना है जो पशुओं में नहीं होती। मनुष्य जन्म केवल खाने, भोग करने और मर जाने के लिए नहीं है, इतना तो पशु भी कर लेते हैं। आज मनुष्य अपनी पहचान, अपना कर्तव्य, स्वभाव सब भूल गया है। यही कारण है कि आज संसार में केवल अनीति, अनाचार, शोषण और तनाव ही व्याप्त है।
प्रश्न यह है कि यथार्थ में धर्म है क्या, क्या है धर्म की सही परिभाषा?
उत्तर है कि धर्म वह व्यवहार है जिससे सामाजिक,भौतिक और आत्मिक उन्नति हो और यश और सफलता प्राप्त हो। भौतिक , सामाजिक और आत्मिक उन्नति का सामंजस्य अत्यावश्यक है। अपने स्वार्थ के लिए केवल भौतिक उन्नति के पीछे भागने का ही नतीजा आज के युग में कोरोना महामारी और अनेकों आपदाएं हैं।
महाभारत में कहा गया है- जो धारण करने योग्य है वही धर्म है। माता-पिता की सेवा, परिवार और समाज के प्रति निःस्वार्थ समर्पणभाव एवं अपने उत्तरदायित्वों का सही ढंग से वहन करना ही धर्म है।
किसी भी वस्तु के स्वाभाविक गुणों को उसका धर्म कहते है जैसे अग्नि का धर्म उसकी गर्मी और तेज है। गर्मी और तेज के बिना अग्नि की कोई सत्ता नहीं। अत: मनुष्य का स्वाभाविक गुण मानवता है। यही उसका धर्म है।
कुरान कहती है – मुस्लिम बनो।
बाइबिल कहती है – ईसाई बनो।
किन्तु वेद कहता है – मनुर्भव अर्थात मनुष्य बन जाओ (ऋग्वेद 10-53-6)।
अत: वेद ही मानवधर्म का नियम शास्त्र है। हमें वेदों को अपने जीवन में महत्व देना चाहिए।
और उनमें दी गई शिक्षाएं अपने जीवन में उतारना चाहिए।
भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते है कि ‘यतो धर्मस्ततो जय:’ अर्थात जहाँ धर्म है वहाँ विजय है आगे आता है कि ‘वेदोsखिलो धर्ममुलं’ अर्थात वेद धर्म का मूल है।
वेदों के आधार पर महर्षि मनु ने धर्म के 10 लक्षण बताए है :-
धृति क्षमा दमोsस्तेयं शौचमिन्द्रिय निग्रह:
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्म लक्षणमं ॥
(1) धृति- कठिनाइयों से न घबराना।
(2) क्षमा- शक्ति होते हुए भी दूसरों को माफ करना।
(3) दम- मन को वश में करना (समाधि के बिना यह संभव नहीं) ।
(4) अस्तेय - चोरी न करना। मन, वचन और कर्म से किसी भी परपदार्थ या धन का लालच न करना ।
(5) शौच- शरीर, मन एवं बुद्धि को पवित्र रखना।
(6) इंद्रिय- निग्रह- इंद्रियों अर्थात आँख, वाणी, कान, नाक और त्वचा को अपने वश में रखना और वासनाओं से बचना।
(7) धी- बुद्धिमान बनना अर्थात प्रत्येक कर्म को सोच-विचारकर करना और अच्छी बुद्धि धारण करना।
(8) विद्या- सत्य वेद ज्ञान ग्रहण करना।
(9) सत्य- सच बोलना, सत्य का आचरण करना।
(10) अक्रोध- क्रोध न करना। क्रोध को वश में करना।
यदि हम इन शिक्षाओं को अपने जीवन में उतारें तो मनुष्य जाति का सार्वभौमिक उत्कर्ष निश्चित है।
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