आए चले भारतीय उपमहाद्वीप के प्रथम सूर्य मंदिर की यात्रा पर...

 


आए चले भारतीय उपमहाद्वीप के सबसे प्रथम सूर्य मंदिर की यात्रा पर!
मुल्तान के सूर्य मंदिर को आदित्य सूर्य मंदिर कहा जाता है. आदित्य सूर्य का ही एक नाम है जो कि उन्हें अपना मां अदिति से मिला है. अदिति के पुत्र होने के कारण सूर्य आदित्य कहलाए. तेज स्वरूप होने के कारण आदित्य नाम भगवान शिव से भी जुड़ा हुआ है.  लेकिन दुर्भाग्य, मंदिर की प्रसिद्ध आदित्य मूर्ति को 10 वीं शताब्दी के अंत में मुल्तान के नए राजवंश इस्माइली शासकों द्वारा नष्ट कर दिया गया था.
मंदिर का उल्लेख मध्ययुगीन अरब के भूगोलवेत्ता अल-मुकद्दासी ने किया था. यह मंदिर इतना विशाल था कि शहर के हाथीदांत और कसेरा बाज़ारों के बीच मुल्तान के सबसे अधिक आबादी वाले हिस्से में फैला था.  
इस मंदिर का इतिहास पांच हजार साल पुराना है. समय चक्र के इतने पीछे चलते हुए हम महाभारत काल में पहुंच जाते हैं. वही काल जहां श्रीकृष्ण अपने सखा अर्जुन को युद्ध में गीता का उपदेश दे रहे हैं. इसी कालखंड के सामानांतर श्रीकृष्ण की एक और कहानी है जो उनके खुद के पुत्र सांब से जुड़ी है.
दरअसल श्रीकृष्ण और जांबवंती का पुत्र सांब  अपने विमाता रुक्मिणी देवी के बारे मे अपने मन मे ही गलत चिंतन करता हैं   तब उसके मन के बात जान कर क्रोधित होकर भगवान श्री कृष्ण ने उसे कुष्ठ रोग हो जाने का श्राप दे दिया. 
सांब को अपनी गलतियों का अहसास हुआ तब श्रीकृष्ण ने अपने पुत्र को क्षमा करते हुए कहा कि तुम अगर  शाकद्वीप के मग ब्राह्मण को बुलाकर उनसे उपचार एवं सूर्य आराधना करो तब यह रोग समाप्त हो सकता है. मग ब्राह्मण ने सांब को हर दिशा और क्षेत्र में घूम-घूमकर सूर्य उपासना के लिए कहा . इस तरह सांब ने देश भू भाग पर 12 स्थानों पर सू्र्य की आराधना की. हर आराधना स्थल पर सांब ने सूर्य मंदिर बनवाए. इसी क्रम में मुल्तान का सूर्य मंदिर भी बनवाया. अन्य मंदिर भारत में स्थित हैं. मुल्तान के सूर्य मंदिर को सूर्य आदित्य मन्दिर कहा जाता था यहीं पर सबसे पहले जम्बूद्वीप में संबापुर या कश्यपपुर (मुल्तान, जिला पंजाब ,पाकिस्तान) जो चन्द्रभागा (चेनाब) नदी के तट पर मग ब्राह्मण को बुला कर विधिवत मंदिर का प्राण प्रतिष्ठा किये जिससे उनका रोग से मुक्त हुई।
उस समय से लेकर मग ब्राह्मण जम्बूद्वीप में बस गए ,वे इस प्रकार रचे बसे की वे जम्बूद्वीप के होकर रह गए ।

हमारे पटना विश्वविद्यालय के पुरातत्व विभाग के प्रोफेसर वासुदेव उपाध्याय जी के पुस्तक " प्राचीन भारतीय मुर्तिविज्ञान " में जिक्र आया हैं कि मग ब्राह्मण द्वारा 12 सूर्य मंदिर बनवाया गया जिसमें इंडो-ईरानी शैली में मूर्ति बना हुआ है।
प्राचीन अभिलेखों में भी दर्ज है आदित्य सूर्य मंदिर
कहते हैं कि मुल्तान का प्राचीन नाम कश्यपपुरा था. यह नाम सूर्य के पिता ऋषि कश्यप के नाम के आधार पर ही था.  ग्रीक एडमिरल स्काईलेक्स ने 515 ईसा पूर्व सूर्य मंदिर का उल्लेख किया गया था. एक अभिलेख के मुताबिक, विदेशी यात्री ह्वेन सांग भी 641 ईस्वी में मंदिर पहुंचा था. ह्वेन सांग के वर्णन में बड़े लाल रूबी पत्थर से बनीं आंखों वाली  शुद्ध सोने की सूर्य प्रतिमा का उल्लेख शामिल है. इसके दरवाजों, खम्भों और शिखर में सोने, चांदी और रत्नों का काफी इस्तेमाल किया गया था. हिंदू इस मंदिर में हजारों की संख्या में प्रतिदिन सूर्य उपासना के लिए पहुंचते हैं. इस मंदिर में विदेशी यात्री ने देवदासी का होना भी लिखा है. बाद के कई और विदेशी यात्रियों के वर्णन में भी अलग-अलग धर्मों की प्रतिमाएं स्थापित होना शामिल है. 
अलबरूनी ने भी किया है वर्णन
11वीं सदी का अल बरूनी का लिखी मुल्तान दौरे की रिपोर्ट कहती है कि इस सदी में मंदिर नष्ट किया गया और फिर कभी नहीं बनवाया गया. उसकी जो लिखा वह ऐसा है कि - अब इस मंदिर में तीर्थ करने कोई नहीं आता. यह नष्ट कर दिया गया है. इसका लगभग दो सदी से कोई निर्माण नहीं कराया गया और अब इसके पत्थर-खंभे कभी इसके बुलंद होने की गवाही भरते हैं. 

इस तरह मग ब्राह्मण के आस्था के केंद्र एवं भारत की इस प्राचीन सांस्कृतिक विरासत को सालों-साल नष्ट करने की कोशिश की गई, लेकिन संस्कृति का यह सूर्य किसी के भी प्रयास से कभी अस्त नहीं हो सका. यह आज भी जगमगा रहा है. उदित होते सूर्य की रौशनी आज भी मुल्तान के इस दैव स्थान पर पड़ती है तो इसके अवशेष अपनी भव्यता की कहानी कहते हैं.  

                               ✍️Anshu mishra


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Comments

  1. Bhut sundar 👌👌👌🙂🙂🙂🙂🙂👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻

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