लोकमंगल की साधना

 


भगवान राम और उनकी मर्यादा का आख्यान रचते हुए तुलसी जिस बात को सबसे मजबूती से रेखांकित करना चाहते हैं, वह है लोकमंगल की भावना। गौरतलब है कि हिंदी आलोचना के बीज शब्द हैं- लोक और परंपरा। तुलसी ने लोकमंगल की दरकार को हमारी सांस्कृतिक परंपरा के साथ जोड़ा। तुलसी जब अपनी रामकथा को ‘मंगल-करनि कलि-मल हरनि’ कहकर उसे ‘सुरसरि’ के समान सभी का कल्याण करने वाली कहते हैं, तो वे उस लोक निर्मिति पर जोर देते हैं जो कल्याणकारी चिंताओं के साथ आगे बढ़ता है।

जिस दौर में तुलसी ने पूर्व प्रतिष्ठित रामकथा के माध्यम से लोकमंगलकारी सत्य धर्म की प्रतिष्ठा का संकल्प किया, उसकी स्थिति बड़ी विलक्षण थी। एक ओर राजनैतिक और आर्थिक पराभव से जनता निराश थी, वहीं दूसरी ओर भोले-भाले लोकमानस को यह जताया जा रहा था कि उनकी सभी विपदाओं का कारण पौराणिक ग्रंथों में प्रतिष्ठित मान्यताएं हैं।

आलम यह था कि विद्वत समाज लोकमानस को दिशा देने के बजाय उसे गुमराह करने में लगा था। संस्कृत भाषा की सर्वोपरिता को सिद्ध करते हुए लोकभाषा और उससे जुड़े विवेक को रौंदा जा रहा था। ऐसे में तुलसी जैसे लोकचेतना कवि मर्यादा का लोकभाष्य लेकर सामने आए। इसके लिए उन्होंने रामकथा की मदद ली और दिखाया कि लोक और मर्यादा का रिश्ता शाश्वत है न कि आरोपित। उनकी काव्य रचना का मूल उद्देश्य ‘लोकमंगल’ की प्रतिष्ठा है- ‘कीरति भनिति भूति भल सोई। सुरसरि सम सब कहं हित होई।।’ अर्थात कीर्ति, कविता और ऐश्वर्य वही अच्छा होता है, जो गंगा के समान सबका हित करने वाला हो। जो कविता लोकमंगल का विधान नहीं करती, जिसे पढ़ने के बाद मन में सद्वृत्तियां जागृत नहीं होतीं, वह भला किस काम की।

हिंदी साहित्य के शीर्ष आलोचक और इतिहासकार आचार्य रामचंद्र शुक्ल के प्रिय कवि हैं गोस्वामी तुलसीदास। उनकी यह पसंद किसी भावुकता या पूर्वग्रह के कारण नहीं है बल्कि ऐसा काव्य के प्रति उनकी आलोचकीय समझ के कारण है। आचार्य शुक्ल ने लोकमंगल की दो अवस्थाएं स्वीकार की हैं। इनमें पहला है- लोकमंगल की सिद्धावस्था: उपभोग पक्ष और दूसरा है- लोकमंगल की साधनावस्था: प्रयत्न पक्ष।


लोकमंगल की सिद्धावस्था को स्वीकार करने वाले कवि प्रेम को ही बीज भाव मानते हैं। प्रेम द्वारा ‘पालन’ और ‘रंजन’ दोनों संभव है। वात्सल्य भाव पालन से जुड़ा है तो दांपत्य भाव रंजन से। कालिदास, रवींद्रनाथ ठाकुर और जयशंकर प्रसाद आदि कवि इसी परंपरा के हैं। लोकमंगल की साधनावस्था के प्रति आस्था रखने वाले कवि करुणा को काव्य का बीज भाव मानते हैं। भवभूति ने तो करुण रस को ही एकमात्र रस माना है। उनका प्रसिद्ध सूत्र है- एको रस: करुण:। महर्षि वाल्मीकि की रामायण का तो प्रथम श्लोक ही करुणा से नहाया है। गौरतलब है कि करुणा की गति ‘रक्षा’ की ओर होती है और प्रेम की ‘रंजन’ की ओर।


अगर गहराई और थोड़े धैर्य के साथ देखें तो लोक में प्रमुखता रक्षा को ही दी जाती है। रंजन का क्रम या अवसर बाद में आता है। तुलसीदास लोकमंगल की इसी साधनावस्था के कवि हैं। जाहिर है कि उनके काव्य में रंजन का धुंधला नेपथ्य भले नजर आ जाए पर बीज भाव तो करुणा ही है। करुणा- जिसकी गति रक्षा की ओर जाती है। तुलसीकृत रामचरितमानस की पूरी कथा को देखें तो हर जगह यह गति और यह दिशा दिखलाई पड़ेगी।


अगर राम सिर्फ पत्नी के लिए असुर रावण के साथ युद्ध करते तो वह समाज के लिए कोई प्रेरणादायक घटना न होती और न ही उससे कोई लोक कल्याण होता। लेकिन हम देखते हैं कि पूरी राम कथा दांपत्य प्रेम की प्रेरणा से प्रकट होकर विशाल मंगलोन्मुखी गति में समाहित हो जाती है। व्यक्ति विशेष की ‘करुणा’ विविध घटना-प्रसंगों से गुजरती हुई लोक के प्रति ‘करुणा’ में तब्दील हो जाती है। इस तरह तुलसी की रामकथा अकेले राम की पीड़ा न होकर लोक की पीड़ा बन जाती है और फिर इस पीड़ा से बाहर निकलने के लिए लोक का मंगल पुरुषार्थ सामने आता है

 संदर्भ पुस्तक

हिंदी साहित्य का इतिहास by रामचंद्र शुक्ल

जनसत्ता सम्पादकीय

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