प्रेम एक अनुभूति

 



दुनिया जिसे असफलता कहती हैं, प्रेम के लिए वो सफलता है। दुनिया जिसे अभाव कहती है, प्रेम के लिए वही सबकुछ है। ( साहित्य के लिए भी क्योंकि 'अभाव से ही भाव आते हैं)


हम प्रेम को जगत के निर्माण प्रक्रिया में अहम तत्व मानते हैं। प्रेम को नारद जी ने नारद भक्ति सूत्र में सूक्ष्मतरं' कहा और ब्रह्म को 'सूक्ष्म' कहा गया है। अर्थात ब्रह्म सूक्ष्म है और प्रेम सूक्ष्मतर' है।


ब्रह्म को 'रसो वैः सः' कहा गया है और प्रेम को रसतमः परम:' अर्थात प्रेम को परमरस कहा गया है।


प्रेम में प्रेमीजन 'ततसुखसुखित्वम् (नारद भक्तिसूत्र ) के भाव से भरे होते हैं और उनका प्रेम अपने प्रेमास्पद के लिए हमेशा बढ़ता रहता है। और यही तो महत्वपूर्ण लक्षण प्रेम का नारद जी ने बताया था।


'प्रतिक्षणं वर्धमानम्' प्रेम वही है जो समय के साथ बढ़ता जाए।


प्रेम में वस्तुत: विरह / वियोग तो होता नहीं वास्तव में विशिष्ट योग का नाम वियोग है। दुनिया के लिए जो अभाव / वियोग है प्रेमी के लिए वही सबकुछ है। क्योंकि प्रेम में कामनाओं का स्थान नहीं हैं। प्रेम के लक्षण निरूपण में नारद जी बता चुके हैं 'गुणरहितं कामनारहितं' ।


प्रेम आनंदमय है अरे जिसमें रोने में भी आनंद आता हो वो आनंदमय तो है ही। विरह में रोने के आनंद को विरहानंद कहते हैं। प्रेम के हर स्थिति हर दशा में एक आनंद है।


                            ✍️ Anshu mishra


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