प्रेम एक अनुभूति 1
_इस पोस्ट में प्रेम की सिद्धान्तपरक चर्चा कर रहा हूँ जिससे आप जानेंगे प्रेम कितना कठिन एवं संसार से परे हैं। अगली पोस्ट में प्रेम की
व्यवहारपरक चर्चा करूँगा जिससे आप जानेंगे प्रेम कितना पास है और कितना आनन्दमय है।
नारद जी से जब पूछा गया कि प्रेम क्या है प्रेम का स्वरूप क्या है ? तब नारद जी ने कहा :
"अनिर्वचनीयं प्रेमस्स्वरूपम्"
( नारद भक्ति दर्शन सूत्र 51 ) प्रेम का स्वरूप अनिर्वचनीय है यानि शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता है।
वेदों ने तो यहाँ तक कहा:
"यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह
(तैत्तरियोपनिषद 2.4&9)
हमारी इन्द्रियां कभी प्रेम के पास नहीं जा सकती है कुछ लोग कहते हैं प्रेम मन की भावना है लेकिन प्रेम मन की भावना
नहीं। प्रेम मन का अटैचमेंट भी नहीं है।
प्रेम अव्यक्त है हालांकि सन्तो महापुरुषों ने प्रेम को समझाने के लिए कुछ न कुछ उदाहरण दिया है लेकिन वे असमर्थ हैं। जैसे:
"कामी नारि पियारी जिमि, लोभी प्रिय जिमि दाम"
प्रेम वैसे ही होता है जैसे कामी को कामिनी प्रिय होती है और जैसे लोभी को दाम प्रिय होता है। लेकिन यह उदाहरण प्रेम नहीं समझा सकता क्योंकि प्रेम के जैसा संसार में कुछ है ही नहीं कि उसका उदाहरण देकर समझाया जा सके कि 'प्रेम' ऐसा होता है।
इस बात को एक उदाहरण से समझिये
नीम के पेड़ का कीड़ा यदि आपसे पूछे कि रसगुल्ला कैसा होता है? तो आप कहोगे मीठा होता है। मीठा मतलब?? आप कहोगे चीनी खाये हो??,, वो कहेगा नहीं,,, आप कहोगे गुड़ खाये हो ??, वो कहेगा नहीं। अरे कोई मीठी चीज खाये हो? मैं नीम का कीड़ा हूँ तब आप कहोगे कि तुम नहीं समझ सकते कि रसगुल्ला कैसा होता है और न ही हम समझा सकते हैं।.
यही स्थिति प्रेम की है।
फिर भी प्रेम की इक मोटी बात ये है कि "जो अपने सुख के लिए हो वो प्रेम नहीं है'
जबकि संसार में हम देखते हैं कि सब अपने सुख के लिए ही कोई कार्य करते हैं।
और वेदों का तो चैलेन्ज है :
"न वा अरे पत्युः कामाय पतिः प्रियो भवत्यात्मनस्तु कामाय पतिः प्रियो भवति!
न वा अरे जायायै कामाय जाया प्रिया भवत्यात्मनस्तु कामाय जाया प्रिया भवति!
न वा अरे पुत्राणां कामाय पुत्राः प्रियाभवन्तियात्मनस्तु कामाय प्रिया भवन्ति पुत्राः
न वा अरे सर्वस्य कामाय सर्व प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय सर्व प्रियं भवति!"
(बृहदारण्यक उपनिषद)
अर्थात पति पत्नी के सुख के लिए कोई काम नहीं करता न ही पत्नी पति के सुख के लिए कोई काम करती है। पुत्र पिता के सुख के लिए कोई काम नहीं करता न ही पिता पुत्र के सुख के लिए कोई काम करता है।
वस्तुतः कोई किसी के सुख के लिए कोई काम नहीं करता सभी अपने अपने स्वार्थों के कारण एकदूसरे से जुड़े हैं।
तो इस तरह के संसार में प्रेम का दिखना कठिन है क्योंकि प्रेम तो दूसरे के सुख के लिए होता है।
नारद जी ने कहा हम बताएंगे प्रेम क्या है उन्होंने कहा :
"गुणरहितं कामनारहितं प्रतिक्षणवर्धमानमविच्छिन्न
सूक्ष्मतरमनुभवरूपम्" ( नारद भक्ति दर्शन, सूत्र 54 )
लेकिन नारद जी भी अंत में कह रहे हैं 'अनुभवरूपम' बताया नहीं जा सकता अनुभव से जाना जा सकता है प्रेम को इसी का उदाहरण देते हैं:
"मूकास्वादनवत"
(नारद भक्ति दर्शन, सूत्र 52 )
जैसे गूँगा खाई हुई वस्तु का स्वाद नहीं बता सकता उसी तरह प्रेम को नहीं बताया जा सकता। ये "गूंगे का गुड़ है।
एक उदाहरण जैसे कोई नदी में डूब रहा है और आवाज करे तो जबतक
डूब रहा है तबतक आवाज आती है जब डूब गया तो आवाज नहीं आती । तो जब तक बोला जा रहा है तब तक प्रेम नहीं है जब डूब गया आवाज भी नहीं आ रही तो प्रेम में डूब गया।
प्रेम बहुत कठिन है अब नारद जी का पहला ही शब्द ले लीजिये "गुणरहितं "
जिससे प्यार करें उसमें गुण न देंखें ये पहली शर्त है। जबकि संसार में हम देखते हैं कि गुण देख कर ही प्यार होता है। ये प्रेम नहीं हो सकता।
जैसे "पेड़ पर फल आये बिना बुलाये पंक्षी आये।
फल झड़ गये पक्षी उड़ गए बिना भगाये । तो यदि प्रेम गुण देख कर किया जायेगा तो गुण के खत्म होने पर प्रेम भी खत्म हो जायेगा।
"असुन्दरः सुन्दरशेखरो वा गुणैर्विहीनो गुणिनां वरो वा
द्वेषी मयि स्यात् करुणाम्बुधिर्वा, कृष्णः स एवाद्य गतिर्ममायम् ।।" --कहता है कि मेरे श्याम चाहे असुन्दर हो या सुन्दरसिरोंमणि हों अवगुणों के खान हों या सर्व गुणसम्पन्न हों वो चाहे जैसे हों वही हमारे प्रियतम थे हैं और रहेंगे।
ये प्रेम है। अब आइये नारद जी के दूसरे शब्द पर
"कामनारहितं"
प्रेम में कोई कामना नहीं होनी चाहिए। नहीं तो फिर कामना नहीं सिद्ध हुआ तो प्रेम खत्म हो जायेगा।
जबकि संसार में कोई भी कामना रहित रह ही नहीं पाता साधारण लोगो की क्या बात करें यहाँ तक कि "सुरपतिः ब्रह्मं पदम् याचते
इन्द्र भी ब्रम्हा के पद की कामना करते हैं।
कामना है तो प्रेम नहीं है।
सुन्दर परिभाषा देंखें :
"आविर्भावदिने न येन गणितो हेतुस्तनीयानपि, क्षीयेतापि न चापराधविधिना नत्या न यो वर्धते ।
प्रेम किसी को मिला तो उसमें "हेतुस्तनीयानपि कोई हेतु कोई कारण नहीं होना चाहिए। यदि हमारा प्रियतम अपराध करे तो भी प्रेम कम न हो ।
रसिक कहते हैं:
"सर्वथा ध्वंसरहितं सत्यपि ध्वनसकारणे यद भावबंधन युनोः स् प्रेमा परिकीर्तितः ॥"
- अर्थात ध्वंसका का कारण समुपस्थित होने पर भी जो ध्वंस नही होता, जो कभी रुकता, घटता और मिटता नही, प्रतिक्षण बढ़ता रहता है, उसे ' प्रेम कहते है।
तीसरा शब्द – प्रतिक्षणवर्धमानं"
प्रेम की सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि जो प्रति क्षण बढ़ता जाये वही प्रेम है
प्रेम की सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि जो प्रति क्षण बढ़ता जाये वही प्रेम
जबकि संसारिक प्रेम घटता जाता है। जैसे परछाई सुबह बड़ी होती है फिर घटती जाती है। जबकि सच्चा प्रेम निरन्तर बढ़ता जाता है।
गौरांग महाप्रभु कहते हैं:
"आश्लिष्य वा पादरतां पिनष्टु मा मदर्शनान्मर्महतां करोतु वा यथातथा वा विदधातु लम्पटो मत्प्राणनाथस्तु स एव नापरः ।।
अर्थात हे श्यामसुन्दर आप तीन ही काम कर सकते हैं:- चाहे आप मुझ दास को अपने से लिपटा कर प्यार करें और चाहे उदासीन बन जाओ और हमको तड़पाओ या फिर चाहे चक्र उठा कर सिर काट दो। लेकिन हर स्थिति में हमारा प्यार बढ़ता ही जायेगा। ये कसौटी है प्रेम की।
"अहिरेव गतिः प्रेसा: स्वभाव कुटिला भवेत् ।" साँप की गति के समान प्रेम की गति भी टेढ़ी होती है। दुलराना भी प्रेम है। और कभी कभी गरियाना भी प्रेम है। भोजन कराना भी प्रेम है और भूखे रखना भी प्रेम संयोग भी प्रेम है और वियोग भी प्रेम ।
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Bahut Sundar
ReplyDeleteBahut hi achha likhe ho.
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