साहित्य
वह शास्त्र जिसमें भावना और भावुकता का सुंदर सामंजस्य हो साहित्य कहा जाता है। बिना भाव, भावना और भावुकता बस जो ईसे धारता है वह अरण्य रोदन करता है या फिर वक् वाद करता है। जो प्रकृति के गंभीर रचना कौशलों को परखने की क्षमता नहीं रखते हैं उनके लिए यह बडा दुर्वह है। दूसरे शब्द में कहे तो भाषा के माध्यम से अपने अंतरंग की अनुभूति, अभिव्यक्ति करानेवाली सौंदर्य या सुकुमारता 'साहित्य' कहलाती है। किन्तु आधुनिक धारणाओं के साहित्य की व्युत्पत्ति को ध्यान में रखकर इस शब्द के अनेक अर्थ प्रस्तुत किए गए है। 'यत' प्रत्यय के योग से साहित्य शब्द की निर्मिति हुई है। शब्द और अर्थ का सहभाव ही साहित्य है। कुछ विद्वानों के अनुसार स हित भाव को साहित्य कहते है। जहां प्राणी मात्र के हित की बात हो वह साहित्य कहलाता है। जैसे कुछ विद्वानों का मत
आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी
जो प्रभावशाली रचना पाठक और श्रोता के मन पर आनंददाई प्रभाव डालती है, कविता कहलाती है। इनके अनुसार काव्य में विलक्षणता होती है, जिसमें आनंद निर्माण करने की क्षमता होती है।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल
साहित्य की परिभाषा के संदर्भ में इनके दो मत देखें जा सकते है।
i. जिस प्रकार आत्मा की मुक्तावस्था ज्ञान दशा कहलाती है, उसी प्रकार हृदय की मुक्तावस्था रस दशा कहलाती है। ह्रदय की मुक्ति की साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द विधान करती आई है, उसे कविता कहते है।
ii. कविता जीवन और जगत की अभिव्यक्ति है।
साहित्य शब्द का प्रयोग 7-8 वीं शताब्दी से मिलता है। इससे पूर्व साहित्य शब्द के लिए काव्य शब्द का प्रयोग होता था। भाषाविज्ञान का यह नियम है, कि जब एक ही अर्थ में दो शब्दों का प्रयोग होता है, तो उनमें से एक अर्थ संकुचित या परिवर्तित होता है। संस्कृत में जब एक ही अर्थ में साहित्य और काव्य शब्द का प्रयोग होने लगा, तो धीरे-धीरे काव्य शब्द का अर्थ संकुचित होने लगा। आज काव्य का अर्थ केवल कविता है और साहित्य शब्द को व्यापक अर्थ में लिया जाता है। साहित्य का तात्पर्य अब कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, आत्मकथा अर्थात गद्य और पद्य की सभी विधाओं से है।
-Anshu mishra
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