विवाह एक संस्कार




 आधुनिक विश्व में विवाह अब अनगिनत विकल्पों और समझौतों का विषय बन गया है. लड़का और लड़की एक-दूसरे को पंद करते हैं और स्वेच्छापूर्वक संविदा में पड़ते हैं. उनके मध्य हुए समझौते की अंत विवाह-विच्छेद या तलाक में होती है. लेकिन पारंपरिक हिन्दू विवाह पद्धति में विकल्पों या संविदा के लिए कोई स्थान नहीं है. यह दो परिवारों के बीच होनेवाला एक संबंध था जिसे लड़के और लड़की को स्वीकार करना होता था. इसमें तलाक के बारे में तो कोई विचार ही नहीं किया गया था मनुष्य जीवन में इस संस्कार का अत्यधिक महत्व है। आज भी प्रत्येक परिवार में वैवाहिक कार्यक्रम अत्यधिक हर्षोल्लास एवं अपनी-अपनी सामर्थ्य के अनुसार अधिकतम व्यय के साथ सम्पन्न कराया जाता है। वैदिक वाग्मय में आश्रम चतुष्टय के सिद्धांत को अधिक सराहा गया है। इस परिप्रेक्ष्य में भी विवाह संस्कार की महत्ता सर्वविदित है। हमारे धर्म शास्त्रों में सोलह प्रकार के संस्कार बताये गये हैं जिन्हें धर्मानुसार मानना आवश्यक है। हमारे कर्म इन्हीं संस्कारों के अनुरूप होने चाहिये। इन्हीं सोलह संस्कारों में एक संस्कार है ‘विवाह संस्कार’।षोडश संस्कारों का भारतीय धर्म परम्परा में अपना विशेष महत्व है। वेदों में जीवन निर्माण को अत्यधिक महत्व दिया गया है, जिसमें गर्भाधान से लेकर मृत्यु तक की क्रिया का विशद विवेचन है। ‘संस्कार’ शब्द का मतलब है–‘स्पर्श द्वारा आकार,’’ अर्थात् एक बीज को स्पर्श देकर उसे पूर्णता तक पहुँचाना ही संस्कार है। संस्कार का तात्पर्य है ‘शुद्ध आकार’ अर्थात पूरे जीवन में अशुद्धता की स्थिति न बने, उच्च विचार, उच्च ज्ञान के साथ वह अपनी यात्रा प्रारम्भ करे। आज के युग में जिन लोगों का दाम्पत्य जीवन सुखपूर्वक बीत रहा है वे सौभाग्यशाली हैं। आज स्थिति यह हो गई है कि 70 प्रतिशत विवाह असफल रहते हैं, घर के स्वर्ग की जो कल्पना की गई है, उसके विपरीत एक तनावपूर्ण कलह और दुःखभरी जिंदगी बनकर ही रह गया है आज का सामान्य गृहस्थ जीवन। इस सबका मूल कारण होता है, एक दूसरे को भली-भांति न समझ पाना और ऐसा तभी होता है, जब दोनों में संस्कारों का अभाव होता हैं।

विवाह की तो अनेक रस्में होती हैं, कर्मकाण्ड होता है, रीति परंपरागत तौर-तरीके होते हैं, वे एक प्रकार से दो अंजान व्यक्तियों के एकीकरण की सामाजिक स्वीकृति मात्र के लिए ही किए जाते हैं। परंतु जिस संस्कार की बात यहां हो रही है, वह आत्मा के स्तर का संस्कार होता है, अर्थात् पति एवं पत्नी का आत्मिक रूप से सामंजस्य, जो कि नितांत आवश्यक होता है। तभी विवाह सुदृढ़ एवं सफल हो सकता है, इसके लिए दोनों पक्षों की न्यूनताओं को दूर करने के लिए प्राचीन समय में दैवीय सहायता का उपयोग किया जाता था, देवताओं से प्रार्थना की जाती थी कि वे वर-वधू को आशीष प्रदान कर उन्हें जीवन में सुख, सौभाग्य, होनहार संतान, यश, सम्मान, वैभव, सुख-सुविधा, धर्म, साधुसेवा, दान आदि सुकृत्यों से धन्य करें। आजकल ऐसा प्रायः देखने में नहीं आता।
त्याग, क्षमा, धैर्य, संतोष--ये सभी मनुष्य जीवन के अलंकार है। इन्हीं गुणों का संग्रह तथा अभ्यास भी विवाह का एक उद्देश्य है। गृहस्थ में रहते हुए दंपत्ति को एक दूसरे के हित के स्वार्थ त्याग, अनुचित व्यवहार में भी क्षमा, अत्यंत कष्ट में भी धैर्य आदि गुणों का प्रयोग करना अनिवार्य हो जाता है। यही गुण विकसित होकर मनुष्य को सामाजिक क्षेत्र में विशिष्ट व्यक्तित्व प्रदान करते हैं। गृहस्थ की इस पाठशाला में त्याग, प्रेम आदि का पूर्ण अभ्यास कर जब दंपत्ति इन दैव गुणों का प्रयोग ईश्वर प्राप्ति एवं अध्यात्म मार्ग में करते हैं, तो वे भगवत्प्राप्ति के अत्यंत सन्निकट पहुंच जाते हैं, जो मानव जीवन का परम लक्ष्य है।


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