आद्यगुरु शंकराचार्य
विदिताखिलशास्त्रसुधाजलधे महितोपनिषत् कथितार्थनिधे ।हृदये कलये विमलं चरणं भव शंकर देशिक मे शरणम् ।।करुणावरुणालय पालय मां भवसागरदुःखविदूनहृदम्। रचयाखिलदर्शनतत्त्वविदं भव शंकर देशिक मे शरणम् ।।
आद्यगुरु शंकराचार्य का जन्म 507 bc(अंग्रेजी मतानुसार 788AD) में वैशाख शुक्ल पंचमी को केरल के कलाड़ी में हुआ था । कलियुग के प्रथम चरण में विलुप्त तथा विकृत वैदिक ज्ञानविज्ञान को उद्भासित और विशुद्ध कर वैदिक वाङ्मय को दार्शनिक, व्यावहारिक, वैज्ञानिक धरातल पर स्थापित करने वाले चतुराम्नाय-चतुष्पीठ संस्थापक नित्य तथा नैमित्तिक युग्मावतार श्रीशिवस्वरुप भगवत्पाद शंकराचार्य की अमोघदृष्टि तथा अद्भुत कृति सर्वथा स्तुत्य है। उन्होंने सभी सनातनियों को अद्वैतवाद( आत्मा और परमात्मा की एकरूपता पर आधारित हैं जिसके अनुसार परमात्मा एक ही समय में सगुण और निर्गुण दोनों ही स्वरूपों में रहता है ) एवं पंचदेव पूजा प्रणाली के द्वारा एक सूत्र में बंधने का श्रेय भगवान शंकराचार्य को ही जाता हैं।
वे भारत की व्यवहारिक ,आध्यात्मिक, वैज्ञानिक और भूगौलिक संरचनाओं की रक्षा के लिए चतुराम्नाय पीठो एवं दशनामी सम्प्रदाय और नाग साधुओं की एक आध्यात्मिक सेना तैयार किये जो चार वेद और उससे सम्बंधित क्रियाकलापों एवं भारत की पर्वतीय , जंगल ,तटवर्तीय क्षेत्र, , शिक्षा संस्थान,मठ ,तीर्थ एवं उसके वासियों को रक्षा एवं उन्हें शिक्षित कर सनातन धर्म का चरमोत्कर्ष पर ले जाने की समुचित व्यवस्था किये थे।

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