पितृपक्ष विशेष
मनुष्य जीवन में तीन ऋण मुख्य माने गये हैं जिनमें देव ऋण ऋषि ऋण तथा पितृ ऋण होते हैं।तमाम लोग ऐसे भी हैं जो मरने के बाद अपने पितरों को पानी पिलाते और हवन व श्राद्ध करके उनकी क्षुधा को शांति करते हैं किंतु जबतक वह जिन्दा रहते हैं तबतक कोई उनकी ख्याल खबर नहीं लेते हैं।इस समय का दौर कुछ ऐसा ही गुजर रहा है।कुछ लोग शादी होते ही लोग माता पिता का साथ छोड़कर अपना अलग आशियाना बना लेते हैं।उनसे माता पिता का जैसे कोई रिश्ता नाता ही नही रह जाता है और गैर से भी अधिक गये गुजरे हो जाते हैं।
माता पिता चिल्लाते रहते हैं और पुत्र बहू अनजान बने मौजमस्ती करते रहते हैं।जो जीवित रहते हुये अपने माता पिता की सेवा नहीं कर पाता है और मरने के बाद पानी देने और श्राद्ध करने का नाटक करता हैं ऐसे लोगों का उनके पितर पानी तक स्वीकार नहीं करते हैं।माता पिता की सेवा सुश्रुषा करके उनके बुढ़ापे की लाठी बनना पितृ ऋण से उद्धार होने का मार्ग माना गया है।जिस तरह बचपन में माता पिता पालन पोषण करते हैं उसी तरह का पालन पोषण वह बुढ़ापे में अपनी संतान से अपेक्षा करते हैं।जो जीवित अवस्था में माता पिता को खाना पानी देकर उन्हें सेवा से खुश रखता है वह मरने के बाद भी उनसे प्रसन्न रहते हैं।जीवित रहने पर एक गिलास पानी नही पिलाया और मरने के बाद उनकी गया ,बद्रीनाथ करके ब्रह्मभोज करने से कोई फायदा नहीं होता है।पितृपक्ष साल में एक बार मनुष्य को पितरों के प्रति कर्तव्य का बोध कराने के लिये आता है। एक ऐतिहासिक घटना है औरंगजेब ने अपने पिता शाहजहां को कारागार में रखा था और पीने के लिए नपा- तुला पानी एक फूटी हुई मटकी में भेजता था। तब शाहजहाँ ने उसे पत्र लिखा जिसकी पंक्तियां थीं
"ऐ पिसर तू अजब मुसलमानी ब पिदरे जिंदा आब तरसानी, आफरीन बाद हिंदवान सद बार में देहदं पिदरे मुर्दारावा दायम आब"
हे पुत्र! तू भी विचित्र मुसलमान है जो अपने जीवित पिता को पानी के लिए भी तरसा रहा है। शत शत बार प्रशंसनीय हैं वे हिन्दू जो अपने मृत पूर्वजो को भी पानी देते है।
इस कर्तव्य का पालन करना मनुष्य जीवन की सार्थकता माना गया है।जो लोग अपने पितरों के प्रति उदासीन रहते हैं उनकी भावी पीढ़ी भी उनके न रहने पर उनकी ही तरह उदास रहती है।
शास्त्र कहते हैं कि "पुन्नामनरकात् त्रायते इति पुत्रः" जो नरक से त्राण ( रक्षा ) करता है वही पुत्र है। श्राद्ध कर्म के द्वारा ही पुत्र पितृ ऋण से मुक्त हो सकता है इसीलिए शास्त्रों में श्राद्ध करने कि अनिवार्यता कही गई हैं।
श्राद्ध का वैज्ञानिक आधार
चन्द्र लोक के ऊपरी भाग में पितृ लोक कहा गया है और पितृ पक्ष के समय चन्द्रमा धरती के सबसे नजदीक होता है जिसके कारण उसकी आकर्षण शक्ति का प्रभाव धरती और उस पर रहने वाले जीवों पर सर्वाधिक पड़ता है।
श्राद्ध का महत्व
जिनके यहाँ से पितरों को अध्ध्य-कव्य मिलता है, उनके पितर तृप्त होकर जाते हैं, आशीर्वाद देते हैं। उनका आशीर्वाद कल्याणप्रद होता है। जो श्राद्ध नहीं करते उनके पितर अतृप्त होकर 'धिक्कार' का नि:श्वास छोड़कर जाते हैं। विष्णु पुराण के अनुसार पितृ आशा के साथ धरती लोक पर आते हैं और सोचते हैं कि क्या कोई ऐसा हमारे कुल में पैदा होगा जो धन को प्राथमिकता ना दे कर हमारे लिए पिंड दान और तर्पण करेगा। श्राद्ध कर्म न करने पर पितृ दोष लगता है जिसका प्रभाव आने वाली पीढ़ियों पर वंशानुगत, शारीरिक और मानसिक रोगों और पीड़ाओं के रूप में दिखता है।
किसी ने हमसे पूछा था कि जो मेरे पूर्वज किसी ओर योनि को प्राप्त हो जाते है तो उनके पास श्राद्ध कैसे प्राप्त होगा ? मेरा उत्तर पूर्वज पितर किसी भी योनि में हो उनके पास श्राद्ध का फल अवश्य पहुँचता हैं ,आपने कभी देखे होंगे किसी के जीवन मे आश्चर्यजनक घटनाएं घट जाता है जैसे गलत रास्ता से एकाएक वह अच्छे रास्ते पर आ जाता है कभी अनन्यास धन की प्राप्ति हो जाता है वगैरह वगैरह यह सब आपके पूर्वजन्मों के कुल के लोगों के द्वारा श्राद्ध का निमित्त फल होता हैं
तर्पण पूर्णतः एक वैदिक रीति हैं जिसमें अपने बिंदु( जिस कुल में जन्म हुआ) एवं नाद (गुरु) परम्परा के पूर्वजों और राष्ट्र , पृथ्वी , तेज , आकाश ,जल एवं वायु के निमित्त श्रद्धा भाव से दिए गए विशिष्ट पदार्थ और जल के द्वारा तृप्त करना ही तर्पण हैं।
गया श्राद्ध विधि
सर्वप्रथम अपने घर मे पिंड दे , और अपने नगर का परिभ्रमण करें शास्त्रों में बताया गया हैं कि गया जाने के लिए घर से निकलने पर चलने वाले एक-एक कदम पितरों के स्वर्गारोहण के लिए एक-एक सीढ़ी बनते जाते हैं. 'गृहाच्चलितमात्रस्य गयायां गमनं प्रति. स्वर्गारोहणसोपानं पितृणां तु पदे-पदे.' और नगर से निकलने के बाद पुनपुन नदी में पिंड दे और उसके बाद गया तीर्थ आये फिर आश्विन कृष्ण प्रतिपदा से अमावस्या तक गया धाम में पिंड दे , और गया में पूर्ण होने के बाद बद्रीविशाल क्षेत्र के ब्रह्मकपाल में अंतिम पिण्ड दे इससे आपके पितर जो कोई भी गति में हो उनका परमपद श्रीनारायण का धाम प्राप्त होता हैं
✍️ Anshu mishra


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