तक्षशिला का गौरवशाली अतीत


"क्यों आया नई शिक्षानीति में तक्षशिला का उल्लेख?"

राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के ड्राफ्ट में सैकड़ों बार हमारे प्राचीन गौरवमय शिक्षाकेंद्र नालन्दा एवं तक्षशिला का उल्लेख आया। आइये आज तक्षशिला के उस गौरवमय स्वरूप को जानते हैं।

तक्षशिला विश्वविद्यालय महाभारत काल से ही प्रख्यात था। यहीं पर धौम्य ऋषि के शिष्य उपमन्यु, आरुणि और वेद ने शिक्षा प्राप्त की थी। भारतीय शिक्षा और संस्कृति का सुप्रसिद्ध केंद्र तक्षशिला भारत के उत्तर पश्चिमी छोर पर गांधार प्रदेश की गौरवशालिनी राजधानी के रूप में प्रतिष्ठित थी। लगभग 1000 वर्षों तक तक्षशिला की ख्याति देश-विदेश में व्याप्त रही और सुदूर प्रदेशों के सैकड़ों विद्यार्थी प्रतिवर्ष तक्षशिला के शिक्षा शिविरों में प्रविष्ट होते रहते थे। 

घने जंगलों, दुर्दम्य पहाड़ों, हिंसक जंतुओं, वर्षा, धूप, बिजली, बवंडर, आंधी-तूफान की परवाह न कर चंपा, मगध, कौशल आदि दूरस्थ प्रांतों के उदीयमान छात्र इस ज्ञान कुंज की ओर सतत आकृष्ट होते रहते थे।

जातकों में ऐसे पिपासु छात्रों की यात्राओं की अनेक कथाएं भरी हैं। भारत के अतिरिक्त मध्य एशिया, अफगानिस्तान, यूनान, सीरिया, फारस आदि देशों से भी बहुसंख्यक विद्यार्थी विशेषत: विज्ञान की शिक्षा के लिए तक्षशिला में शिक्षा ग्रहण करते थे। सातवीं सदी ईस्वी पूर्व में ही तक्षशिला को शिक्षा केंद्र के रूप में अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त हो गई थी। छठी सदी ईस्वी पूर्व में सुप्रसिद्ध व्याकरण पाणिनि ने अपनी अष्टाध्यायी के स्वप्न यहीं देखे थे। कुछ दिन बाद मौर्य साम्राज्य के महात्म्य तथा अर्थशास्त्र के सुप्रसिद्ध लेखक चाणक्य ने भी अर्थशास्त्र के प्रारंभिक पाठ्य यहीं ग्रहण किए थे। बुद्ध के समसामयिक राजगृह के सुप्रसिद्ध वैद्य जीवक ने ओषधिशास्त्र की शिक्षा यहीं प्राप्त की थी।

अपने वैभव के लम्बे इतिहास में तक्षशिला को कई बार दुर्दिन भी देखने पड़े। अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण तक्षशिला को स्वभावत: विदेशी आक्रांताओं के निर्मम प्रहार सहने पड़े। ई. पूर्व छठी शताब्दी में पारसियों के द्वारा, ईसवी पूर्व दूसरी शताब्दी में भारतीय यूनानियों के द्वारा, ईसवी पूर्व प्रथम शताब्दी में शकों के द्वारा तथा कुषाणों के द्वारा यह क्रमशः अधिकृत हुई।

आक्रमणों तथा विदेशी प्रभुत्व में तक्षशिला की क्या दुर्दशा हुई होगी यह सहज ही अनुमान किया जा सकता है। इसके खंडहरों की खुदाई से यह स्पष्ट है कि विद्वानों की यह नगरी अनेक बार उजड़ी तथा बसी। आक्रमण की पाशविक बर्बरता में स्वभावतः यह विध्वंश कर दी जाती होगी तथा राज्य स्थापना के पश्चात यह पुनः विजेताओं के द्वारा बसाई जाती होगी। खंडहरों के पर्यवेक्षण से यही निष्कर्ष निकलता है। 

ऐसे संकट काल में तक्षशिला के शिक्षा केंद्र कुछ समय तक अवश्य ही विश्रृंखल हो जाते थे, किंतु नगरी के पुनरुत्थान के पश्चात फिर यह नई ज्योति से जगमग होने लगते थे। यहां के शिक्षालयों का गौरव को इतना महान था कि लगातार भूचाल के पश्चात भी ये मिट नहीं सके, न मिटाये जा सके। हां, इनके स्वरूप में कुछ परिवर्तन अवश्य हुए जोकि अवश्यंभावी थे। 

फारसी संसर्ग तथा आधिपत्य के कारण भारत की राष्ट्रीय लिपि 'ब्राह्मी' तक्षशिला से निष्कासित हुई। भारतीय यूनानियों के लगभग सवा 100 वर्ष के लंबे आधिपत्य में तक्षशिला के पाठ्य विषय तथा कार्यक्रम दोनों में ही यथेष्ट रूपांतर हुए। दो सुसमृद्ध सभ्यताओं के सम्मिलन में पारस्परिक आदान-प्रदान अपेक्षित ही था। तक्षशिला के शिक्षा केंद्रों में ग्रीक भाषा की शिक्षा दीक्षा होने लगी तथा यूनानी लेखक एवं दार्शनिक सम्मानित होने लगे। राज्य भाषा होने के कारण यूनानी भाषा का व्यावहारिक महत्व था। इस तथ्य से तक्षशिला के शिक्षालय स्वभावत: विमुख नहीं रह सकते थे। 

इनके छात्रों में ऐसे भी थे जो कि उन्होंने राज्य में उच्च पदों की आकांक्षा रखते थे। इनकी आवश्यकता की पूर्ति भी शिक्षा केंद्रों को करनी थी। यूनानी कला कौशल भी तक्षशिला में संभवतः सिखाये जाने लगे थे। यहां के पाठ्य विषयों के 18 शिल्पों में यूनानी शिल्पकला भी सम्मिलित थी। किंतु तक्षशिला का रंग रूप अधिकतर भारतीय ही रहा। अपनी मूल मातृभूमि से भारतीय यूनानी लगभग विच्छिन्न से हो गए थे और फलत: उनकी सभ्यता और संस्कृति यूनान की अपेक्षा भारत से ही अधिक प्रभावित रही।

इस प्रकार तक्षशिला में यूनानी प्रभाव विशेष ना पड़ सका। शकों तथा कुषाणों के पास कुछ ऐसी संस्कृति की बातें न थी जिन्हें तक्षशिला को सीखना होता।  संस्कृति क्षेत्र में इन्होंने भारत की अधीनता ही स्वीकार की और इसलिए तक्षशिला के आंतरिक स्वरूप में इन विजेताओं के कारण कोई महत्वपूर्ण परिवर्तन लक्षित ना हुआ। 

तक्षशिला की कीर्ति का श्रेय उसकी संस्था को ना था बल्कि तक्षशिला के उन शिक्षकों को था जिनके पांडित्य का यश देश विदेश में था। ये शिक्षक किसी एक विषय अथवा विषय समूह के पूर्ण ज्ञाता तथा विशेषज्ञ होते थे। अपनी विषय की उच्च शिक्षा यह स्वतंत्र रूप से अपने निवास स्थान पर ही संचालित करते थे। इस प्रकार तक्षशिला में अनेक ऐसे गुरुकुल अथवा विद्यालय थे जहां विषय विशेष की उच्च तथा विशेष शिक्षा प्रदान की जाती थी। ये विद्यालय अपने अपने विशेषज्ञ शिक्षक के द्वारा आयोजित तथा व्यवस्थित रहते थे। ये किसी संस्था विशेष से संयोजित संचालित या स्वीकृत नहीं थे। इस प्रकार तक्षशिला विश्वविद्यालय न था बल्कि एक शिक्षा केंद्र था, जहां तत्कालीन सभी विषयों की उच्चतम शिक्षा दी जाती थी। तक्षशिला के खंडहरों में एक भी ऐसा लंबा चौड़ा कमरा अभी तक नहीं मिला है जो कि विश्वविद्यालय के छात्रों के व्याख्यान के लिए उपयुक्त था। यह स्पष्ट है कि तक्षशिला की शिक्षा वैयक्तिक रूप में वहां के शिक्षकों के द्वारा ही संचालित रहती थी। जातकों के अनुसार तक्षशिला के सुविख्यात शिक्षकों के पास 500 विद्यार्थी एकत्र रहते थे। श्री अलतेकर की मान्यता में छात्रों द्वारा वर्णित यह संख्या अतिशयोक्ति है तथा एक शिक्षक के संरक्षण में 20 से अधिक छात्र नहीं रहते थे। किंतु यह युक्तिसंगत प्रतीत नहीं होता है कि अंतरराष्ट्रीय ख्याति के विशेषज्ञ के पास 20 ही छात्र देश विदेश में पढ़ने आते होंगे। अतः यह भी अनुमान किया जा सकता है कि परम प्रसिद्ध शिक्षकों के पास 500 या उसके लगभग शिक्षार्थी रहते होंगे।

इतनी बड़ी संख्या की शिक्षा तथा देखरेख एक व्यक्ति के द्वारा असंभव थी। यह बहुत संभव है कि एक सुप्रसिद्ध शिक्षक के कई सहायक होते होंगे तथा उसके अनुभव एवं सुयोग्य विद्यार्थी भी उसकी सहायता किया करते होंगे। प्राचीन भारत में तो यह पद्धति पूर्णता प्रचलित थी। अतः जातकों के उपर्युक्त कथन सर्वथा असत्य नहीं जान पड़ते। स्वयं अलतेकर ने सुतसोम जातक में वर्णित 103 राजकुमारों का एक शिक्षक के अंतर्गत धनुर्विद्या सीखना संभव माना है। यह शिक्षक भी उनकी सम्मति में कई सहायकों के द्वारा सम्बलित था। स्पष्ट यह बात 130 से अधिक छात्रों के लिए भी लागू हो सकती थी।

तक्षशिला का परवर्ती इतिहास पूर्णतया ज्ञात नहीं। संभव है यह कुषाण वंश के अंत तक क्रियाशील रही। कुषाणों के उत्तराधिकारी जंगली थे। उनके राजत्व काल में तक्षशिला की दशा अवश्य ही काफी गिर गई थी। पांचवी सदी के प्रारंभ में प्रसिद्ध चीनी यात्री फाह्यान ने तक्षशिला में कुछ भी उल्लेखनीय नहीं पाया।  स्पष्ट है तक्षशिला के शिक्षालय मृतप्राय हो गए होंगे। पांचवी शताब्दी ई. के प्रारम्भ में हूणों का आक्रमण हुआ। तक्षशिला की बची खुची गुरुता सर्वदा के लिए विलुप्त हो गयी। ह्वेनसांग को यहाँ के निकट विहारों के भग्नावशेष के अतिरिक्त कुछ देखने को नहीं मिला था। इसी प्रकार शिक्षा के दीप्तिमान सूर्य सदा के लिए अस्त हो गया ।
                              

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