शिव का सच्ची उपासना


शिव की उपासना दो प्रकार के भक्त करते है ।एक जो शिव को चाहता है ,दूसरा जो शिव से चाहता। इस आर्टिकल में हम शिव को चाहने वालों के लिए उपासना पर चर्चा करते हैं।  शिवो भूत्वा शिवं यजेत' अर्थात शिव बनकर ही शिव की पूजा करें।   शिव जैसे कोई बन नहीं  सकता  हैं।अर्थात  वे परमेश्वर है, वह सृष्टि के निर्माण  और विनाश  दोनों कर  सकते हैं। यहां पर हम शिव के  स्वभाव के बारे में चर्चा कर रहा हूं। शिव का अर्थ कल्याण है अगर आपको शिव की  सच्ची भक्ति  करनी हो तो अपने अंदर के शिव तत्व  को जो सुप्त है, उसे जगाना होगा उनके गुणों को अपने अंदर स्थापित करना होगा जैसे क्षमा, दया,किसी को सेवा करना ,किसी पर अनुग्रह करना इत्यादि।  आप गरीब जरूरतमंद के सेवा करें , उन सब की की सेवा शिव का सेवा क्योंकि शिव  इस ब्रह्मांड पिता है। यह सब उनका ही  रचना है ,उनका रचना को हम रखरखाव करेंगे तो आप निश्चित की  शिव का कृपा बरसेगा। शिव के प्रसन्न करने का एक और तरीका  उनकी अर्धांगिनी शक्ति अर्थात प्रकृति ,आप प्रकृति की सेवा करने लगे ,उसमें वृक्षारोपण, प्रकृति का रखरखाव, सफाई , इत्यादि करने लगे तो जल्द ही  आप पर  शिव प्रसन्न होंगे।  आये हम शिव से जुड़े प्रतीक के बारे में जाने,
भगवान शिव का तीसरा नेत्र विवेक का प्रतीक है। इसके खुलते ही कामदेव नष्ट हुआ था अर्थात विवेक से कामनाओं को विनष्ट करके ही शांति प्राप्त की जा सकती है। उनके गले में सपरें की माला दुष्टों को भी गले लगाने की क्षमता तथा कानों में बिच्छू के कुंडल कटु एवं कठोर शब्द सहने के परिचायक हैं। मृगछाल निरर्थक वस्तुओं का सदुपयोग करने और मुंडों की माला जीवन की अंतिम अवस्था की वास्तविकता को दर्शाती है। भस्म लेपन, शरीर की अंतिम परिणति को दर्शाता है। भगवान शिव के अंतस का यह तत्वज्ञान शरीर की नश्वरता और आत्मा की अमरता की ओर संकेत करता है।  जब समुंद्र से विष निकला तो उसे भगवान शिव को दिया गया और उसे  पीकर संसार के अभय दान दिया और नीलकंठ कहलाए इसलिए तो उनको देवों के देव महादेव कहते हो इसी प्रकार किसी भी परिवार के या संस्था के मुखिया को  अपने प्रति उल्टा सीधा सुनकर  जो विष हैं। उसे पीकर भगवान शंकर के समान हंसते मुस्कुराते रहना चाहिए तब जाकर वह मुखिया बनता है ।जैसे भगवान शंकर इस संसार के मुखिया है।धार्मिक कहे जाने वाले कुछ व्यक्तियों ने शिव-पूजा के साथ नशे की परिपाटी जोड़ रखी है। लेकिन आश्चर्य है कि जो शिव- अज अनवघ अकाम अभोगी जो सदा शुद्ध हैं ।जिनमें घोर नहीं है वे अघोर हैं ऐसे विराट पवित्र व्यक्तित्व नशा कैसे कर सकता है? भांग, धतूरा, चिलम-गांजा जैसे घातक नशे करना मानवता पर कलंक है, अत: शिव भक्तों को ऐसी बुराइयों से दूर रहकर शिव के चरणों में बिल्व-पत्र ही समर्पित करना चाहिए। बेल के तीन पत्र हमारे लोभ, मोह, अहंकार के प्रतीक हैं, जिन्हें विसर्जित कर देना ही श्रेयस्कर है। शंकर जी हाथ में त्रिशूल इसलिए धारण किए रहते हैं, ताकि दुखदाई इन तीन भूलों को सदैव याद रखा जाए।
आप सब पर सदा शिव का आशीर्वाद बना रहे।
                    "  हर हर महादेव"
       Follow us

Comments

Popular posts from this blog

ऊर्जा संरक्षण के सिद्धांत

शिक्षित, लेकिन कमजोर होता समाज

धर्म और आधुनिक समाज (धर्म क्या है ?)