योग का मानव जीवन मे महत्व
भारतीय शास्त्रीय परंपरा में 'मानव जीवन अमूल्य व मानव देह दुर्लभ' है। इस कारण हमारा धर्म भी है और कर्म भी हैं कि हम इस जीवन व शरीर की रक्षा करें। मानव के लिए न केवल शरीर की बल्कि अंर्तमन की आत्मा की शुद्धि की बात कही गई है। शुद्धि के कई साधनों में एक निर्विवाद साधन योग रहा है |
गणित की भाषा में योग का अर्थ जोड़ दिया गया है। जब हम स्वयं को स्वयं की विकृतियों के विरुद्ध जोड़ने लगते हैं, तो इसके लिए योग की आवश्यकता पड़ती है। यह जड़ता आंतरिक भी हो सकती है और बाहरी भी। उनके विरुद्ध विजय का ब्रम्हास्त्र योग है।
आज मानव जीवन में दो कठिनाइयों हैं-
एक अवसादग्रस्त जीवन, जिसमें मनुष्य की लालसाएं, कामनाएं, आवश्यकताएं अति की ओर अग्रसर होकर इतनी उग्र हो जाती हैं कि उनके अभाव में मनुष्य जीवन में विचारों से संतुलन नहीं बिठा पाता है।
दूसरी चुनौती बाहर है, जिसे योग के द्वारा पराजित करने की शक्ति हासिल की जा सकती है। हमने अब तक भी रिपोर्ट्स, स्टडीज, रिसर्च देखे हैं, उनमें एक बात स्पष्ट रूप से देखने में आ रही है, कि यदि आपका इम्यून सिस्टम अच्छा रहेगा, तो कोरोना से समान नहीं है और योग में इम्यून सिस्टम को अच्छा करने की बात है। हैं।
आंतरिक योग दिवस को वर्ष 2014 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने 21 जून को आंतरिक योग दिवस के रूप में मनाए जाने की घोषणा की और संयुक्त राष्ट्र में 193 सदस्यों में से 175 देशों ने बिना किसी दौड़ के 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के रूप में मनाया। । । । के प्रस्ताव को मंजूरी दी थी।
योग करने से पहले इस बात की भी जानकारी होना आवश्यक है कि क्या योग है?
भारत में इसे एक आध्यात्मिक प्रक्रिया के तौर पर देखा जाता है, जिसमें शरीर, मन और आत्मा को एक साथ लाया जाता है। योग शब्द की उत्पत्ति ही युज शब्द से हुई है, जिसका मतलब है जोड़ना। श्री कृष्ण ने भी गीता में कहा है कि 'योगः कर्मसु कौशलम' अर्थात योग से कर्मों में कौशल आता है। योग की उच्च अवस्था समाधि होती है, जो मोक्ष या कैवल्य तक ऋति है। विश्व में कल्याण की भावना से योग दिवस से हम योग को आत्मसात करें और इस भारतीय दर्शन, कैवल्य का अर्थ जैन धर्म के अनुसार ज्ञान प्राप्ति होती है। आइए, हम सब मिलकर संकल्प लें कि विश्व योग दिवस पर भारत को विश्व गुरु बनाने की दिशा में हम सब एक होकर इस तरह आगे बढ़ेंगे। हमारे योग की ऊर्जा से विश्व में बंधुत्व, स्नेह और परिवार की भावना को बल मिलेगा।जिस वसुधैव कुटुंबकम की परिकल्पना हमारे शास्त्रों ने हजारों से साल पहले की थी, उसके साकार रूप को गढ़ने में हमारी छोटी छोटी कोशिशें बहुत बड़ी भूमिका अदा करेगी।
यात्रा तो केवल एक ही है ....... भीतर की .....
बाकी सब भटव .....
"विश्व योगदिवस पर समर्पित"

Good
ReplyDelete