योगदृष्टिकोण में प्राणायाम


योगसूत्र कार महर्षि पतंजलि के अनुसार प्राणायाम अष्टांग योग का एक महत्वपूर्ण अंग  है इसके द्वारा ही प्रत्याहार धारणा ध्यान और समाधि अवस्थाएं परिपुष्ट होती है यह दो शब्द के योग से बना है -प्राण+आयाम=प्राणायाम।
  वस्तुतः मानव शरीर में जीवन का आधार एकमात्र प्राण है ,जो हृदय में रहता है जो नाभि से चलकर ह्रदय फुफ्फुस और कण्ठ से होते हुए श्वास रूप में बाहर निकलता है और आकाश में सदा व्याप्त जाने वाले अमृत( शुद्ध वायु यानी ऑक्सीजन ) को पीकर प्रश्वास के रूप में शरीर में चला जाता हैं यह क्रिया जीवन भर निरन्तर होती रहती है।
सामान्य श्वसन की क्रिया प्रति मिनट 18 होती हैं, वराहोपनिषद,हँसोपनिषद के अनुसार 24 घण्टे में 21600 बतायी गयी हैं। देखा गया हैं कि दौड़ते ,क्रोध ,भय ,काम , शारीरिक श्रम के समय श्वसन क्रिया तेजी से होने लगति हैं।
प्रणायाम करने की विधि -सर्वप्रथम श्वास -प्रश्वास फेफड़ों में भरना,रोकना और फिर धीरे-धीरे छोड़ना चाहिए।
कुछ सावधानियां-

1 प्राणायाम करने से पहले हमारा शरीर अन्दर से और बाहर से शुद्ध होना चाहिए।

2 बैठने के लिए नीचे अर्थात भूमि पर आसन बिछाना चाहिए।

3बैठते समय हमारी रीढ़ की हड्डियाँ एक पंक्ति में अर्थात सीधी होनी चाहिए।

4 सुखासन, सिद्धासन, पद्मासन, वज्रासन किसी भी आसन में बैठें, मगर जिसमें आप अधिक देर बैठ सकते हैं, उसी आसन में बैठें।

5 प्राणायाम करते समय हमारे हाथों को ज्ञान या किसी अन्य मुद्रा में होनी चाहिए।

6 प्राणायाम करते समय हमारे शरीर में कहीं भी किसी प्रकार का तनाव नहीं होना चाहिए, यदि तनाव में प्राणायाम करेंगे तो उसका लाभ नहीं मिलेगा।

7प्राणायाम करते समय अपनी शक्ति का अतिक्रमण ना करें।


8 ह्‍र साँस का आना जाना बिलकुल आराम से होना चाहिए।

9 जिन लोगो को उच्च रक्त-चाप की शिकायत है, उन्हें अपना रक्त-चाप साधारण होने के बाद धीमी गति से प्राणायाम करना चाहिये।





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