श्री रविन्द्र नाथ टैगोर का आध्यत्मिक दर्शन
टैगोर के जीवन दर्शन में मानव करूणा का महत्वपूर्ण स्थान है। वे भारतीयों की गरीबी से अत्यधिक द्रवित हो जाते थे। इसने उनकी जीवन दृष्टि को व्यापक रूप से प्रभावित किया। गुरूदेव के व्यक्त्वि का दूसरा पक्ष भी अत्यन्त महत्वपूर्ण था। उन्हें मानव की निर्णय लेने एवं उसे क्रियान्वित करने की इच्छा शक्ति पर दृढ़ विश्वास था। उनका मानना था कि "हम जो भी नवनिर्माण करना चाहते है, उसमें व्यक्ति या समाज किसी के भी आत्मसम्मान को ठेस नहीं पहुँचना चाहिए तथा ऐसा कोई कार्य नहीं चाहिए जिससे जीवन के आध्यात्मिक और संसारिक पक्षों में दुराव हो।
अपने निबन्ध 'द पोएट्स स्कूल मे गुरूदेव ने लिखा "मानव इस संसार में इसलिए नहीं आया है कि वह इसके बारे में सारी सूचनांए एकत्रित करे तथा उसे अपना दास बनाए, वह इसे यहाँ अपना घर बनाने आया है, वह यहाँ जीव मात्र का सहयोगी और वसुधा का पूजक बनने आया है, वह यहाँ प्रेम, कलात्मक रचनात्मकता तथा आनन्द के द्वारा अपनी इच्छा को पूर्ण करने आया है। गुरूदेव की दृष्टि में इन सब को जीवन के प्रति सम्पूर्ण उपागम को अपनाकर पाया जा सकता है, न कि आंशिक विकास एवं स्वार्थ के द्वारा।"
टैगोर को मानव की क्षमता में पूर्ण विश्वास था। उन्होंने व्यक्त्वि के सामन्जस्यपूर्ण विकास पर बल दिया। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जब मानव जाति पर गंभीर संकट आया उस समय भी महाकवि ने मानव के विवेक पर आस्था जताते हुए कहा कि हम इस संकट को पार कर सृजनात्मक जीवन के लक्ष्य को प्राप्त करेंगे। टैगोर व्यक्ति के सम्मान और उसकी स्वतंत्रता में आस्था रखते थे।
टैगोर ने अपना आध्यात्मिक विचार व्यक्त किया है कि- ”हमें ईश्वर को उसी प्रकार अनुभव करना चाहिए जिस प्रकार हम प्रकाश का अनुभव करते हैं । उसका अनुभव संसार में प्रत्येक क्षण होनेवाली क्रियाओं और प्रतिक्रियाओं में होता है । ऐसा इसलिए कि ये सभी ईश्वरीय इच्छा से संबंधित और प्रेरित होती हैं ।”
वे ईश्वर और ब्रह्म को तर्क से जानने की सलाह नहीं देते । उनका तो कहना है-ईश्वर और ब्रह्म को प्रेम और अनुभूति से जानने का प्रयत्न करना चाहिए । यही कारण है कि वे शंकराचार्य के तर्क और निर्गुण अद्वैत ब्रह्म के विचार से सहमत नहीं होते ।
रवींद्रनाथ टैगोर ब्रह्म-विग्रह का मानवीयकरण करके देखते हैं । मानवीय आधारों पर ही वे ब्रह्म-साक्षात्कार की शिक्षा देते हैं । वे मानव को ब्रह्म का ही एक विग्रह मानते हैं । ईश्वर और ब्रह्म में उनकी पूरी आस्था है । वे दोनों के प्रति आस्तिक और सगुणवादी विचार रखते हैं । उनका मानना है कि ईश्वर से मानव को जोड़ने वाले दो भाव हैं और वे हैं- प्रेम और आनंद ।
रवींद्रनाथ टैगोर जीव की आत्मा को ब्रह्म से अलग मानते हैं । वहीं यह भी मानते हैं कि आत्मा यद्यपि स्वतंत्र है तथापि उसकी स्वतंत्रता ईश्वर की इच्छा पर निर्भर है । उनका विचार है कि जीव-आत्मा का लक्ष्य ब्रह्म में लीन होना नहीं है, बल्कि अपने को पूर्ण बनाना है । उपनिषद्-सिद्धांतों के आधार पर उन्होंने आत्मा के तीन रूप निर्धारित किए हैं, जो हैं- (१) अस्तित्व और रक्षा-भावना, (२) अस्तित्व का ज्ञान (३) आत्माभिव्यक्ति
रवींद्रनाथ टैगोर भक्ति में प्रबल आस्था रखते हैं-फिर भक्ति का अस्तित्व प्रेम के अभाव में होता ही नहीं । इससे सुस्पष्ट होता है कि वे प्रेम-साधना को स्वीकार करते हैं, दोनों ही धरातलों पर-वैचारिक और व्यावहारिक ।उनकी काव्य-कृतियाँ गूढ़ हैं, जो प्रेम-साधना की परिचायक हैं । अपनी-रहस्यात्मकता को बनाए हुए वे विश्व का आह्वान करते हैं कि प्रेम से बढ़कर कुछ भी नहीं है । एक-दूसरे से प्रेम करो । उनका तर्क है कि प्रेम से लय होता है और लय से लीनता । वे प्रेम के उभय पक्षों के प्रति आस्था रखते हैं-संयोग प्रेम-साधना और वियोग प्रेम-साधना ।
धर्म और ‘नैतिकता’ को परिभाषित करते हुए टैगोर ने स्पष्ट शब्दों में कहा है- मेरा धर्म मानव का धर्म है, जिसमें अनंत की परिभाषा ‘मानवता’ है । नैतिकता के प्रति अपना विचार वे इस रूप में व्यक्त करते हैं- ”पशु का जीवन नैतिकता से रहित होता है, किंतु मनुष्य में नैतिकता की व्याप्ति अवश्य होनी चाहिए ।”
जहाँ तक धर्म और नैतिकता की बात है, दोनों का एक-दूसरे से घनिष्ठ संबंध है । उनके अनुसार-सच्चा धर्म नैतिक चेतना को उन्नत बनाता है । यही कारण है कि वे धर्म और नैतिकता को एक ही दृष्टि से देखते हैं । वे क्षणिक और वासनामय सुख के विरोधी हैं । वे आध्यात्मिक और आत्मिक सुख को ‘वास्तविक सुख’ की संज्ञा देते हैं । उनका मानना है कि दुःख के पोषण से नैतिकता में अभिवृद्धि होती है ।
उनके जन्म दिवस पर सत सत नमन🙏

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