ब्रह्मचर्य एक साधना
ब्रह्मचर्य एक उत्कृष्ट तप हैं इसके जैसा तीनों लोक में तप नही हैं। ''ब्रह्मचर्य तपसा देव :" इसके तप से देवता अमर होते हैं।ब्रह्मचर्य स्वस्थ जीवन की आधारशिला है। ब्रह्मचर्य का अर्थ है,संयम, नियम एवं सदाचारपूर्वक शान्त-वदि से वीर्य को धारण करना और उसकी रक्षा करना। इसकी पूर्ण रक्षा और परिपक्वता के लिये ही ब्रह्मचर्याश्रम बनाया गया था। ऋषियों ने मानव-जीवन को ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास इन चार आश्रमों में विभाजित किया था। इन चारों आश्रमों में ब्रह्मचर्य आश्रम का स्थान प्रथम है, क्योंकि आगे के तीनों आश्रम इसी की पुष्टता और परिपक्वता पर आधारित हैं। जिस व्यक्ति की 25 वर्ष तक की अवस्था पूर्ण संयम और सदाचारपूर्वक व्यतीत होती है और वह अपने वीर्य की पूर्ण रूप से रक्षा करता है, उसका भावी जीवन अत्यन्त सुखपूर्वक व्यतीत होता है, वह जीवन भर शक्तिशाली और प्रतापी बना रहता है। बीमारी, उदासी, अधीरता, हीनता आदि दोष कभी उसके पास नहीं आते, वह बुद्धिमान और बलवान होता है। जिस प्रकार एक भवन की दृढ़ता, मजबूती, परिपक्वता, चिरस्थायित्व उसकी नींव पर आधारित होती है, यदि नींव कमजोर है या खोखली है, तो उस पर बनाया हुआ मकान शीघ्र ही पृथ्वी पर गिर पड़ेगा, उसमें आँधी और तूफान के थपेड़ों को सहन करने की शक्ति कहाँ? उसी प्रकार जीवन रूपी भवन की आधारशिला अर्थात् नींव ब्रह्मचर्य है।
स्पर्म बनाने की प्रक्रिया
खाना खाते हैं उससे वीर्य बनने की काफी लम्बी प्रक्रिया है।यह बनाने की प्रक्रिया 29 दिन में पूर्ण होता हैं ।खाना खाने के बाद खून बनता हैं।खून से मांस ,मांस से हीमोग्लोबिन और उससे अस्थि ,अस्थि से अस्थिमज्जा बनता है और अंत मे स्पर्म बनता हैं।स्पर्म किसी में भी नही बदलता । वह ऊर्ध्व होकर तेज ओज में परिवर्तित होता हैं।इसका नेचर ही पतन होना हैं किन्तु इसे अपने सूझ बूझ से ऊर्ध्वगामी बनाना है। यह जीवन शक्ति है ।यह विद्यार्थियों ओर योगियों के ईंधन हैं।वैज्ञानिक स्वयं कहतें हैं कि वीर्य में हाई क्वालिटि प्रोटीन,कार्बोहाईड्रेट आदि होतें हैं। जो कि हमारे शरीर को बल प्रदान करते हैं
इसके पतन से रोग - स्मरण शक्ति का क्षय, गैस होना, श्वसन सम्बंधित रोग ,हदय सम्बंधित रोग , नपुंसकता,उत्साहहीनता, स्पर्म की कव्यलिटी में कमी,बाल का रोग ,आलस्य ,मोटापा, डर भय से ग्रसित ।ये कहे कि यह वीर्य का धारण ही जीवन हैं इसका क्षय ही मृत्यु का वरन हैं ।
जो वीर्यनाश करते हैं वो परलौकिक क्या वह भौतिक जगत में सफल नही हो सकता हैं।
आज के युवा भाई वीर्य की रक्षा करते हुये एग्जाम का तैयारी करें तो अवश्य कहि न कहीं क्षेत्र में सफल होंगे ।
ब्रह्मचर्य कम से कम 25 वर्ष तक अर्थात शादी के पहले तक अवश्य रहे उसके बाद , जो पुत्र प्राप्त होगा उसे क्या कहना वह तेजस्वी, कुलीन, कलानिधि, महावीर ,प्रतिभा के धनी होगा ।

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