नाम साधना से भगवत्प्राप्ति


एक बार नारद जी ने भगवान ब्रह्मा जी से कहा
ऐसा कोई उपाय बतलाइए, जिससे मैं कलिकाल के काल जाल में न फँसूं।"
इसके उत्तर में ब्रह्माजी ने कहाः आदिपुरुषस्य नारायणस्य नामोच्चारणमात्रेण निर्धूत कलिर्भवति।
‘आदि पुरुष भगवान नारायण के नामोच्चार करने मात्र से ही मनुष्य कलि से तर जाता है।’

कलिकाल में नाम की महिमा का बयान करते हुए भगवान वेदव्यास जी श्रीमदभागवत में कहते हैं-

कृते यद् ध्यायतो विष्णुं त्रेतायां यजतो मखैः ।

द्वापरे परिचर्यायां कलौ तद्धरिकीर्तनात् ।।

सतयुग में भगवान विष्णु के ध्यान से, त्रेता में यज्ञ से और द्वापर में भगवान की पूजा-अर्चना से जो फल मिलता था, वह सब कलियुग में भगवान के नाम कीर्तन मात्र से ही प्राप्त हो जाता हैश्रीरामचरितमानस’ में गोस्वामी तुलसी दास जी महाराज इसी बात को इस रुप में कहते हैं-

कृतजुग त्रेताँ द्वापर पूजा मख अरु जोग ।

जो गति होइ सो कलि हरि नाम ते पावहिं लोग ।।

‘सतयुग, त्रेता और द्वापर में जो गति पूजा, यज्ञ और योग से प्राप्त होती है, वही गति कलियुग में लोग केवल भगवान के नाम से पा जाते हैं ।’
आगे गोस्वामी जी कहते हैं-

कलिजुग केवल हरि गुन गाहा ।

गावत नर पावहिं भव थाहा ।।

कलिजुग जोग न जग्य न ग्याना ।

एक आधार राम गुन गाना ।।

सब भरोस तजि जो भज रामहि ।

प्रेम समेत गाव गुन ग्रामहि ।।

सोइ भव तर कछु संसय नाहीं ।

नाम प्रताप प्रगय कलि माहीं ।।


कलियुग में न तो योग और यज्ञ है और न ज्ञान ही है । श्री राम जी का गुणगान ही एकमात्र आधार है । अतएव सारे भरोसे त्यागकर जो श्रीरामजी को भजता है और प्रेमसहित उनके गुणसमूहों को गाता है, वही भवसागर से तर जाता है, इसमें कुछ भी संदेह नहीं । नाम का प्रताप कलियुग में प्रत्यक्ष है ।’

मंत्रजप से चित्त पावन होने लगता है | रक्त के कण पवित्र होने लगते हैं | दुःख, चिंता, भय, शोक, रोग आदि निवृत होने लगते हैं | सुख-समृद्धि और सफलता की प्राप्ति में मदद मिलने लगती है |


जैसे, ध्वनि-तरंगें दूर-दूर जाती हैं, ऐसे ही नाह-जप की तरंगें हमारे अंतर्मन में गहरे उतर जाती हैं तथा पिछले कई जन्मों के पाप मिटा देती हैं | इससे हमारे अंदर शक्ति-सामर्थ्य प्रकट होने लगता है और बुद्धि का विकास होने लगता है | अधिक मंत्र जप से दूरदर्शन, दूरश्रवण आदि सिद्धयाँ आने लगती हैं, किन्तु साधक को चाहिए कि इन सिद्धियों के चक्कर में न पड़े, वरन् अंतिम लक्ष्य परमात्म-प्राप्ति में ही निरंतर संलग्न रहे | इस वर्तमान युग मे इसका प्रदुर्भव बंगाल के चैतन्य महाप्रभु के द्वारा हुआ जो उन्हें श्रीगया जी में वैराग्य उत्पन्न होने के बाद  उनके गुरु के द्वारा 16 अक्षर वाले यह महामन्त्र दीये गये थे जो आज इस्कॉन के द्वारा उसे यरोपियन ,अमेरिका, भारत जैसे देशों में इसका प्रचार प्रशार कर रहे हैं।

।। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे, हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।।



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