गर्भाधानसंस्कार के पश्चात् कृत्य
गर्भाधानसंस्कार विधिवत सम्पन्न हो जाना सृष्टिकर्म का प्रथम पायदान तुल्य है। आगे की क्रियायें और सावधानियाँ तो अब शुरु होने वाली हैं, जिसके लिए सिर्फ गर्भिणी स्त्री ही नहीं, बल्कि उसके पति सहित परिवार के अन्य जन को भी ध्यान रखना है। आयुर्विज्ञान के सिद्धान्तों के साथ-साथ पौराणिक कथाओं में भी इन नियमों और कृत्यों की विस्तृत चर्चा है। धर्मशास्त्र अपने ढंग से नियम सुझाते हैं,तो आधुनिक परिवेश के अनुसार डॉक्टर अपने हिसाब से औषधि-प्रयोग, सख्ती और परहेज सुझाते हैं और सनातनी व्यवस्था में निर्दिष्ट बातों पर ध्यान बिलकुल नहीं देते, जिसका दुष्परिणाम आए दिन लोग भुगत रहे हैं, फिर भी चेत नहीं रहे हैं। मत्स्यपुराण के सप्तम अध्याय में दैत्यमाता दिति एवं महर्षि कश्यप सम्वादक्रम में गर्भिणीचर्या पर विस्तृत चर्चा है। कथा रोचक और ज्ञानवर्द्धक है। यहाँ सिर्फ गर्भकाल के पालनीय नियमों की चर्चा करते हैं। यथा— सन्ध्यायां नैव भोक्तव्यं गर्भिण्या वरवर्णिनि.... से संवाद शुरु होता है और ग्यारह श्लोकों में महर्षि बहुत कुछ कह जाते हैं, जिनपर आधुनिकाओं को अवश्य विचार करना चाहिए। हालाँकि ब...