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गर्भाधानसंस्कार के पश्चात् कृत्य

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  गर्भाधानसंस्कार विधिवत सम्पन्न हो जाना सृष्टिकर्म का प्रथम पायदान तुल्य है। आगे की क्रियायें और सावधानियाँ तो अब शुरु होने वाली हैं, जिसके लिए सिर्फ गर्भिणी स्त्री ही नहीं, बल्कि उसके पति सहित परिवार के अन्य जन को भी  ध्यान रखना है। आयुर्विज्ञान के सिद्धान्तों के साथ-साथ पौराणिक कथाओं में भी इन नियमों और कृत्यों की विस्तृत चर्चा है। धर्मशास्त्र अपने ढंग से नियम सुझाते हैं,तो आधुनिक परिवेश के अनुसार डॉक्टर अपने हिसाब से औषधि-प्रयोग, सख्ती और परहेज सुझाते हैं और सनातनी व्यवस्था में निर्दिष्ट बातों पर ध्यान बिलकुल नहीं देते, जिसका दुष्परिणाम आए दिन लोग भुगत रहे हैं, फिर भी चेत नहीं रहे हैं।   मत्स्यपुराण के सप्तम अध्याय में दैत्यमाता दिति एवं महर्षि कश्यप सम्वादक्रम में गर्भिणीचर्या पर विस्तृत चर्चा है। कथा रोचक और ज्ञानवर्द्धक है। यहाँ सिर्फ गर्भकाल के पालनीय नियमों की चर्चा करते हैं। यथा—  सन्ध्यायां नैव भोक्तव्यं गर्भिण्या वरवर्णिनि.... से संवाद शुरु होता है और ग्यारह श्लोकों में महर्षि बहुत कुछ कह जाते हैं, जिनपर आधुनिकाओं को अवश्य विचार करना चाहिए। हालाँकि ब...

निर्गुण संत काव्य परंपरा के कवि संत रैदास

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  भारतीय संत परंपरा ने उस दौर में समाज और संस्कृति को संवेदना, सौहार्द और आस्था जैसे मानवीय सरोकारों से जोड़ा, जब बाकी दुनिया मध्यकालीन अंधेरे में डूबी थी। इन संतों में रैदास का नाम कई कारणों से विशिष्ट है। कबीर की तरह रैदास भी जातीय और धार्मिक सामाजिक ढांचे पर न सिर्फ सवाल खड़े करते हैं बल्कि वे प्रेम और समन्वय की बात कहकर सामाजिक सद्भाव के लिए बड़ी पहल भी करते हैं। रैदास को श्रद्धा के साथ लोग संत रविदास के रूप में भी याद करते हैं। उनका जन्म चर्मकार परिवार में हुआ था। बताया जाता है कि जिस दिन उनका जन्म हुआ था उस दिन रविवार था। इसी कारण उनका नाम रविदास रखा गया। उनका जन्मस्थान काशी है। पर उनकी ख्याति और स्वीकृति ने स्थान और भाषा की दूरी को अपने समय में ही मिटा दी थी। भारत के किसी भी संत को शायद ही इतने अलग-अलग नामों से पुकारा गया होगा, जितना कि रैदास को। पंजाब के लोगों ने अपने उच्चारण की सहजता में उन्हें रविदास कहा। ‘आदि ग्रंथ’ या ‘गुरुग्रंथ साहिब’ में जहां कहीं भी उनके पद संकलित हैं, वहां उनका नाम रविदास ही लिखा गया है। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान में उन्हें रैदास के नाम...

आए चले भारतीय उपमहाद्वीप के प्रथम सूर्य मंदिर की यात्रा पर...

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  आए चले भारतीय उपमहाद्वीप के सबसे प्रथम सूर्य मंदिर की यात्रा पर! मुल्तान के सूर्य मंदिर को आदित्य सूर्य मंदिर कहा जाता है. आदित्य सूर्य का ही एक नाम है जो कि उन्हें अपना मां अदिति से मिला है. अदिति के पुत्र होने के कारण सूर्य आदित्य कहलाए. तेज स्वरूप होने के कारण आदित्य नाम भगवान शिव से भी जुड़ा हुआ है.  लेकिन दुर्भाग्य, मंदिर की प्रसिद्ध आदित्य मूर्ति को 10 वीं शताब्दी के अंत में मुल्तान के नए राजवंश इस्माइली शासकों द्वारा नष्ट कर दिया गया था. मंदिर का उल्लेख मध्ययुगीन अरब के भूगोलवेत्ता अल-मुकद्दासी ने किया था. यह मंदिर इतना विशाल था कि शहर के हाथीदांत और कसेरा बाज़ारों के बीच मुल्तान के सबसे अधिक आबादी वाले हिस्से में फैला था.   इस मंदिर का इतिहास पांच हजार साल पुराना है. समय चक्र के इतने पीछे चलते हुए हम महाभारत काल में पहुंच जाते हैं. वही काल जहां श्रीकृष्ण अपने सखा अर्जुन को युद्ध में गीता का उपदेश दे रहे हैं. इसी कालखंड के सामानांतर श्रीकृष्ण की एक और कहानी है जो उनके खुद के पुत्र सांब से जुड़ी है. दरअसल श्रीकृष्ण और जांबवंती का पुत्र सांब  अपने विम...

लोकमंगल की साधना

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  भगवान राम और उनकी मर्यादा का आख्यान रचते हुए तुलसी जिस बात को सबसे मजबूती से रेखांकित करना चाहते हैं, वह है लोकमंगल की भावना। गौरतलब है कि हिंदी आलोचना के बीज शब्द हैं- लोक और परंपरा। तुलसी ने लोकमंगल की दरकार को हमारी सांस्कृतिक परंपरा के साथ जोड़ा। तुलसी जब अपनी रामकथा को ‘मंगल-करनि कलि-मल हरनि’ कहकर उसे ‘सुरसरि’ के समान सभी का कल्याण करने वाली कहते हैं, तो वे उस लोक निर्मिति पर जोर देते हैं जो कल्याणकारी चिंताओं के साथ आगे बढ़ता है। जिस दौर में तुलसी ने पूर्व प्रतिष्ठित रामकथा के माध्यम से लोकमंगलकारी सत्य धर्म की प्रतिष्ठा का संकल्प किया, उसकी स्थिति बड़ी विलक्षण थी। एक ओर राजनैतिक और आर्थिक पराभव से जनता निराश थी, वहीं दूसरी ओर भोले-भाले लोकमानस को यह जताया जा रहा था कि उनकी सभी विपदाओं का कारण पौराणिक ग्रंथों में प्रतिष्ठित मान्यताएं हैं। आलम यह था कि विद्वत समाज लोकमानस को दिशा देने के बजाय उसे गुमराह करने में लगा था। संस्कृत भाषा की सर्वोपरिता को सिद्ध करते हुए लोकभाषा और उससे जुड़े विवेक को रौंदा जा रहा था। ऐसे में तुलसी जैसे लोकचेतना कवि मर्यादा का लोकभाष्य लेकर सामने आए। इ...

किसानों की एक विरहन व्यथा

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  पिछले साल बैसाख में भौजी गवना करा के आई थी,ककन छूटे दू दिन हुआ था और मेहँदी अभी छूटा नहीं था कि चार दिन बादे गेंहू का कटनी शुरू हो गया। हाय! रे किसानी… मजबूरी भी तो थी।करेंगे नहीं तो खाएंगे का ? मोहना उस दिन मेहरारू को देखकर खूब तेज गाना गाये थे…”जइसन खोजले रहनी ओइसन धनिया मोर बाड़ी..सांवर ना गोर बाड़ी हो……”   भौजी लजाकर घूंघट काढ़ धीरे से कही थी…”भक्क”   दूसरे दिन पसीना से भौजी का सिंदूर भीगकर काजल से मिल गया था…तब उन नाजूक हाथों से बोझा नहीं उठ रहा था..बड़े असहाय नज़रों से भौजी ने मोहना की तरफ देखा था.मानों मन ही मन गा रहीं हों…   ‘नइहर के दुलरुई हईं बाड़ा सुकुवार ए पिया.. कंटिया ना होई हमसे राखs बनिहार ए पिया’..   हाय!…….इतना सुनते ही मोहना के करेजा से परेम फफाकर बहने लगा था..”अरे हमार मेहरारू”। देखते ही देखते मोहना बोझा अपने कपार पर ले लिए..’छोड़ दs आराम करा हम बानी न”…..  आस-पास के लोग देखकर हंसने लगे……”बाप रे मोहना अपनी मेहरारू को केतना मानता है न “?  अगेले दिन तो रमेसर बो चाची मोहना के माई से खेते में कह दी…..   “इहे सीरी देवी आईल ...

पुराने v/s आधुनिक युग के प्रेमी नायिका

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  पुराने ज़माने की महबूबा को पता रहता था कि एक दिन मेरी शादी अगर किसी सरकारी नौकरी वाले से हो गई तो मेरा ये भोला आशिक़ बहुत करेगा तो सिगरेट पीना छोड़कर दारू पीना शुरू कर देगा और गुड्डू रंगीला के गाने न सुनकर अल्ताफ़ राजा और अताउल्ला खान को सुनने लगेगा। बहुत मजबूर होगा तो बाएं हाथ से आँसू पोछते हुए दाहिने हाथ से मेरी शादी में बारात की ख़ातिरदारी करेगा। और दुर्योग से थोड़ा बुद्धिजीवी होगा तो दिल टूटने के बाद “गुनाहों का देवता” पढ़कर कवि या शायर बन जाएगा और आगे चलकर लोगों का वक्त बर्बाद करेगा। रफ़ी नें गाया भी है..”मैं कहीं कवि न बन जाऊँ तेरे प्यार में ए कविता।” कई बार लगता है कविता की बर्बादी यहीं से शुरू हुई होगी। खैर! उस ज़मानें की महबूबाएं बहुत इंटेलेक्चुअल हुआ करतीं थीं। वो ये भी जानती थीं कि बेचारे प्रेमी का अगर दिल टूट गया तो उसके पास साधु बनने का भी पर्याप्त स्कोप हैं। आज ऐसे न जानें कितने साधु सड़कों पर टूटा हुआ दिल लेकर घूम रहें हैं। फ़िराक़ का एक शेर है। आए थे हँसते खेलते मय-ख़ाने में ‘फ़िराक़’ जब पी चुके शराब तो संजीदा हो गए “ मुझे लगता है कि फ़िराक़ बाबा इसमें इशारों-इशारों म...

चाहत

  चाह आनो से पैसो में आती रही। चाह पैसों से नोटों बनाती रही । चाह नोटों से गड्डी चुनती रही। चाह गड्डी से मोटर में आती रही। चाह मोटर से होटल में जाती रही। चाह होटल में बोतल खुलाती रही। चाह क्या-क्या न करती कराती रही। चाह पा ली जिन्होंने पिले हुए। चाह छोड़ी जिन्होंने रसीले हुए। चाह जी से लगा जी जरा हो गया। चाह हर से लगा जी हरा हो गया। चाह उनके हमे हर कदम चाहिए। वे अगर चाह ले तो फिर क्या हमें चाहिए।